लाडली बहनों की मदद चीनी की महंगाई में स्वाहा; जनता पूछ रही सवाल

विशेष रिपोर्ट:

देश में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने (Ethanol Blending) की योजना को लेकर किए गए बड़े-बड़े दावों पर अब महंगाई का साया पड़ता दिख रहा है। दावा था कि गन्ने से एथेनॉल बनाकर पेट्रोल में मिलाने से ईंधन के दाम घटेंगे और गाड़ियों का प्रदूषण कम होगा। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है—पेट्रोल के दाम जस के तस बने हुए हैं, हवा में प्रदूषण का स्तर कम नहीं हुआ, और दूसरी तरफ गन्ने के डायवर्जन की वजह से देश में शक्कर की कीमतें आसमान छूने लगी हैं।

‘लाडली बहना’ का पैसा शक्कर के डिब्बे में गायब

​मध्यम और गरीब परिवारों के लिए घरेलू बजट संभालना भारी पड़ रहा है। सरकारी योजनाओं (जैसे लाडली बहना योजना) के तहत महिलाओं के बैंक खातों में आने वाली आर्थिक सहायता का एक बड़ा हिस्सा अब सीधे बढ़ी हुई कीमतों वाली शक्कर खरीदने में खर्च हो रहा है।

​महिलाओं का कहना है:

“सरकार एक हाथ से खाते में मदद डालती है, तो दूसरे हाथ से महंगाई के जरिए वह पैसा किराने की दुकान पर निकल जाता है। चाय और बच्चों के दूध की मिठास भी अब जेब पर भारी पड़ रही है।”

तीन बड़े मोर्चों पर उठे सवाल

  • न पेट्रोल सस्ता हुआ: जनता को उम्मीद थी कि जब देश में बने एथेनॉल को मिलाया जाएगा, तो ईंधन के खुदरा दामों में सीधी राहत मिलेगी, लेकिन पेट्रोल की कीमतें अब भी आम आदमी की जेब खाली कर रही हैं।
  • न घटा प्रदूषण: शहरों में वायु गुणवत्ता (AQI) का संकट लगातार बना हुआ है। जमीनी स्तर पर प्रदूषण में कोई बड़ा चमत्कारी बदलाव देखने को नहीं मिला।
  • शक्कर की कीमतों में आग: गन्ने के रस और शीरे का बड़ा हिस्सा एथेनॉल फैक्ट्रियों में जाने के कारण बाजार में चीनी का उत्पादन गिरा, जिससे थोक और खुदरा बाजारों में शक्कर के दाम तेजी से बढ़ गए।

जनता की मांग:

उपभोक्ताओं और विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार को अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा करनी चाहिए। जब तक आम जनता को सस्ता पेट्रोल और स्वच्छ हवा का सीधा लाभ न मिले, तब तक रसोई की जरूरी चीजों—खासकर शक्कर—को महंगा करने वाली नीतियों पर पुनर्विचार होना चाहिए।

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