नेताओं में ‘भगवान’ खोजने की सनक: सियासत की चापलूसी या धर्म पर सीधा प्रहार?

भारतीय राजनीति में इन दिनों एक अजीब और चिंताजनक ट्रेंड देखने को मिल रहा है। कहीं पोस्टरों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान श्री राम के रूप में दर्शाया जाता है, तो कहीं अखिलेश यादव को भगवान श्री कृष्ण के रूप में पेश किया जाता है। सोशल मीडिया और चुनावी रैलियों में शुरू हुआ यह प्रचार अब गंभीर चर्चा का विषय बन चुका है कि क्या राजनीतिक अंधभक्ति धार्मिक आस्था की गरिमा को ठेस पहुंचा रही है?

अखिलेश यादव भगवान श्री कृष्ण के रूप में

आस्था के नाम पर राजनीतिक चापलूसी

धर्म और संस्कृति के जानकारों का मानना है कि किसी भी साधारण इंसान या नेता की तुलना आराध्य देवों से करना धार्मिक मान्यताओं के पूरी तरह खिलाफ है। भगवान को सर्वोच्च और सर्वगुण संपन्न माना गया है, जबकि राजनेता केवल जनता के प्रतिनिधि होते हैं। समर्थकों द्वारा इस तरह की तस्वीरें और पोस्टर बनाना केवल अंधभक्ति और राजनीतिक चापलूसी को बढ़ावा देता है।

सांस्कृतिक मूल्यों से भटकता समाज

आज के दौर में धर्म को केवल नारों, सोशल मीडिया के प्रचार और लाउडस्पीकर के शोर तक सीमित कर दिया गया है।

 धर्म का मूल उसके ग्रंथ, संस्कार, सत्य और नैतिक मूल्यों में है।

 जब जनता वास्तविक धार्मिक शिक्षाओं को छोड़कर नेताओं की व्यक्तिगत भक्ति में लीन हो जाती है, तो संस्कृति का मूल स्वरूप कमजोर होने लगता है।

 जानकारों का कहना है कि अगर लोग धार्मिक ग्रंथों और संस्कारों को गंभीरता से नहीं समझेंगे, तो धर्म की मूल पहचान धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी।

लोकतंत्र और जनचेतना पर असर

एक स्वस्थ लोकतंत्र में जनता का काम नेताओं से उनके काम, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार पर सवाल पूछना है। लेकिन जब किसी नेता को भगवान का दर्जा दे दिया जाता है, तो उसकी जवाबदेही खत्म हो जाती है। अंधभक्ति में डूबी जनता सवाल पूछना बंद कर देती है, जिससे नुकसान जनता का ही होता है।

जागरूकता ही एकमात्र समाधान

धर्म और राजनीति को अलग रखना ही लोकतंत्र और संस्कृति दोनों के हित में है। यदि समाज ने राजनीतिक चेहरों और वास्तविक आराध्य देवों के बीच के फर्क को नहीं समझा, तो यह न केवल लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करेगा, बल्कि सनातन संस्कृति के वास्तविक गौरव को भी नुकसान पहुंचाएगा।

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