लखनऊ |

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके से सोमवार (२२ जून) को एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। पुरानिया एरिया के उषा मेहता मार्ग पर स्थित एक ३-मंजिला इमारत में दोपहर के समय भीषण आग लग गई। इस दर्दनाक हादसे में अब तक १५ मासूम लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें से ज्यादातर १६ से २७ साल के छात्र-छात्राएं हैं। घटना में कई अन्य लोग गंभीर रूप से झुलस गए हैं, जिनका इलाज अस्पताल में चल रहा है।

इस बहुमंजिला इमारत में एक एनिमेशन कोचिंग सेंटर और गेमिंग स्टूडियो (Head Hopper Studio), एक डिजिटल लाइब्रेरी (Learning Space) और ग्राउंड फ्लोर पर एक पेट क्लिनिक व शोरूम संचालित हो रहा था।

कैसे और कब भड़की आग? (SIT जांच में बड़े खुलासे)

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, सोमवार दोपहर लगभग ३:०० बजे बिल्डिंग की बीच वाली मंजिल से अचानक तेज धुआं निकलने लगा। देखते ही देखते आग ने पूरी बिल्डिंग को अपनी चपेट में ले लिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर गठित एसआईटी (SIT) की शुरुआती जांच में हादसे के निम्नलिखित मुख्य कारण सामने आए हैं:

 एसी ओवरहीटिंग और शॉर्ट-सर्किट: जून की भयंकर गर्मी के कारण बिल्डिंग में लगे एयर कंडीशनर्स (AC) और भारी कंप्यूटिंग सिस्टम्स पर लोड बहुत ज्यादा था। शुरुआती रिपोर्ट में शॉर्ट-सर्किट को ही आग की मुख्य वजह माना जा रहा है।

 फायर ट्रैप बनी बिल्डिंग (दम घुटने से मौत): चौंकाने वाली बात यह है कि ज्यादातर बच्चों की मौत आग से जलने के बजाय धुएं के कारण दम घुटने (Suffocation) से हुई। बिल्डिंग में वेंटिलेशन (हवा और धुआं निकलने का रास्ता) न होने के कारण धुआं अंदर ही भर गया। घबराए छात्र खुद को बचाने के लिए वॉशरूम में छिप गए और वहीं बेहोश हो गए।

 रिहायशी इलाके में अवैध कमर्शियल हब: यह इमारत कागजों पर रेसिडेंशियल (रहने के लिए) पास थी। लेकिन नियमों को ताक पर रखकर इसमें बिना किसी सुरक्षा मानकों के भारी बिजली लोड वाला कोचिंग सेंटर और लाइब्रेरी चलाई जा रही थी।

क्या टाली जा सकती थी यह मौतों की आग?

इस हादसे ने एक बार फिर शहरों में चल रहे अवैध कोचिंग सेंटर्स और व्यावसायिक इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर इन बातों का ध्यान रखा जाता तो आज ये मासूम जिंदा होते:

१. सिंगल एग्जिट (निकास द्वार) की लापरवाही: पूरी बिल्डिंग में ऊपर आने-जाने के लिए सिर्फ एक ही संकरा रास्ता था। आग लगते ही वह रास्ता बंद हो गया। अगर इमारत में नियमों के मुताबिक ‘इमरजेंसी एग्जिट’ (आपातकालीन सीढ़ी) होती, तो बच्चों को खिड़कियों से कूदने की नौबत नहीं आती।

२. फायर सेफ्टी उपकरणों का शो-पीस होना: जांच में पाया गया कि बिल्डिंग में लगे फायर एक्सटिंग्विशर या तो एक्सपायर्ड थे या काम नहीं कर रहे थे। बिल्डिंग में न तो स्मोक डिटेक्टर लगे थे और न ही ऑटोमैटिक वॉटर स्प्रिंकलर्स।

३. प्रशासनिक अनदेखी: अगर स्थानीय प्रशासन और फायर विभाग ने समय रहते इस आवासीय इमारत की चेकिंग की होती और बिना फायर एनओसी (NOC) के चल रहे इस हब को सील किया होता, तो यह बड़ा हादसा कभी नहीं होता।

सख्त एक्शन: ४ गिरफ्तार, ४ बड़े अधिकारी सस्पेंड

हादसे के बाद उत्तर प्रदेश सरकार एक्शन मोड में है। मुख्यमंत्री के कड़े रुख के बाद पुलिस और प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई की है:

 गिरफ्तारी और एफआईआर: इस मामले में लापरवाही और गैर-इरादतन हत्या की धाराओं के तहत ६ लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई है, जिनमें से ४ मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है (रामकृष्ण उपाध्याय, वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला और तुशोक कृष्ण जयसवाल शामिल हैं)।

 अधिकारियों पर गाज: ड्यूटी में घोर लापरवाही बरतने के आरोप में इलाके के ४ बड़े प्रशासनिक अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया है।

 मुआवजे का ऐलान: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया है। पीड़ित परिवारों के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से आर्थिक सहायता (मुआवजे) की घोषणा की गई है।

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