वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिकी संसद के निचले सदन (House of Representatives) ने रूस और ईरान पर शिकंजा कसने के लिए कड़े प्रावधानों वाला ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ 262-159 के बहुमत से पारित कर दिया है। सीनेट से पहले ही मंजूरी हासिल कर चुका यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक का भारी आयात शुल्क (टैरिफ) लगा सकें। इस फैसले का सीधा असर भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों पर पड़ने की संभावना है। 17 सितंबर की टाइमिंग: महज संयोग या सोचा-समझा संदेश? इस विधेयक को पारित करने के लिए चुनी गई 17 सितंबर की तारीख अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन गई है। जन्मदिन पर कूटनीतिक झटका: 17 सितंबर को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन था। ठीक इसी दिन अमेरिकी संसद में भारत जैसे तेल खरीदार देशों पर 100% टैरिफ लगाने का बिल पारित होना कई राजनीतिक विश्लेषकों को सामान्य विधायी प्रक्रिया नहीं लग रहा। रणनीतिक दबाव का संकेत: कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि अमेरिका अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूत साझेदारों को यह संदेश देने के लिए प्रतीकात्मक तारीखों का इस्तेमाल करता है कि उसके अपने भू-राजनीतिक हित व्यक्तिगत दोस्ती या द्विपक्षीय संबंधों से ऊपर हैं। संसदीय एजेंडा बनाम राजनीतिक संदेश: आधिकारिक तौर पर अमेरिकी संसद इसे अपने तय विधायी कैलेंडर (Legislative Schedule) का हिस्सा बता रही है, लेकिन नई दिल्ली के सत्ता गलियारों में इसे रूस से तेल खरीद पर भारत पर सीधा दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। बिल के मुख्य प्रावधान रूसी ऊर्जा राजस्व को झटका देना: अमेरिका का मकसद रूस की ऊर्जा कमाई पर रोक लगाकर यूक्रेन युद्ध में उसकी वित्तीय क्षमता को कमजोर करना है। राष्ट्रपति के हाथ में अंतिम फैसला: यह कानून किसी देश पर तुरंत 100% टैरिफ लागू नहीं करता। यह केवल अमेरिकी राष्ट्रपति को यह विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power) देता है कि वे किस देश पर कितना शुल्क लगाएं और किसे रणनीतिक छूट (Waiver) दें। भारत और चीन सीधे दायरे में: यूक्रेन संकट के बाद से भारत और चीन रियायती दरों पर रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार रहे हैं, जिससे यह कानून सीधे तौर पर इन देशों के व्यापार को प्रभावित कर सकता है। भारत पर क्या हो सकता है असर? निर्यात क्षेत्र के लिए जोखिम: यदि अमेरिका भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लागू करता है, तो अमेरिका जाने वाले टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग सामान महंगे हो सकते हैं। ऊर्जा नीति में संतुलन की चुनौती: देश में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रखने के लिए भारत रूस से सस्ता तेल खरीदता रहा है। कानून लागू होने पर भारत को अपनी आयात नीति की समीक्षा करनी पड़ सकती है। घरेलू लेन-देन पूरी तरह सुरक्षित: इस कानून का असर सिर्फ अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आयात-निर्यात पर पड़ेगा। देश के भीतर सामान्य बैंकिंग, यूपीआई लेन-देन या रोजमर्रा के घरेलू खर्च पर इसका कोई प्रभाव नहीं होगा। भारत के पास क्या हैं विकल्प? कूटनीतिक छूट (Waiver) की मांग: भारत पहले भी ईरान और रूस पर लगे प्रतिबंधों के दौरान सामरिक साझेदारी और ऊर्जा सुरक्षा का हवाला देकर अमेरिकी छूट हासिल करता रहा है। भारत इस बार भी वॉशिंगटन के साथ उच्च स्तरीय बातचीत करेगा। ऊर्जा स्रोतों में बदलाव: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए केवल एक देश पर निर्भर नहीं है। जरूरत पड़ने पर भारत इराक, सऊदी अरब, यूएई या खुद अमेरिका से कच्चे तेल का आयात बढ़ाकर टैरिफ के दबाव को नियंत्रित कर सकता है। क्वाड और सामरिक संतुलन: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को संतुलित करने के लिए अमेरिका को भारत के मजबूत साथ की जरूरत है। भारत इस अहमियत का इस्तेमाल कूटनीतिक मेज पर दबाव को कम करने के लिए करेगा। अब यह विधेयक अंतिम हस्ताक्षर के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की मेज पर है। राष्ट्रपति के फैसले के बाद ही यह साफ होगा कि अमेरिका तुरंत सख्त कदम उठाता है या फिर भारत जैसे साझेदार देश के साथ कूटनीतिक बातचीत के जरिए बीच का रास्ता निकालता है। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Post navigation भारत-बांग्लादेश के बीच फिर दौड़ेंगी ट्रेनें: मैत्री, बंधन और मिताली एक्सप्रेस अगले महीने से हो सकती हैं शुरू, जानिए कब और क्यों हुई थीं बंद