भोपाल। मध्य प्रदेश की सड़कों पर इन दिनों चमचमाती डामर कम, गड्ढों से उठती धूल ज्यादा नजर आती है। जब भोपाल और इंदौर जैसे प्रदेश के सबसे बड़े और प्रमुख शहरों के बीचों-बीच तक सड़कें पूरी तरह दम तोड़ चुकी हैं, तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी छोटे शहरों और कस्बों का क्या हाल होगा। सवाल यह है कि जिस प्रदेश का बजट हर साल नए रिकॉर्ड बनाता है, उसी प्रदेश में बुनियादी निर्माण कार्यों के लिए सरकारी तिजोरी अचानक खाली क्यों दिखने लगती है? इस सवाल का जवाब छिपा है राज्य के बहीखाते में। मध्य प्रदेश आज लगभग 4.40 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक कर्ज तले दबा हुआ है। गणित सीधा है—नवजात शिशु से लेकर बुजुर्ग तक, प्रदेश के हर एक नागरिक के माथे पर औसतन 50,000 से 52,000 रुपये की उधारी दर्ज हो चुकी है। खजाना खाली, सिर्फ ब्याज भरने में जा रहे 25,000 करोड़ रुपये राज्य सरकार हर साल अपनी गाढ़ी कमाई से लगभग 2.30 लाख करोड़ रुपये जुटाती है। लेकिन इस कमाई का एक बड़ा हिस्सा सीधे बैंकों और वित्तीय संस्थानों का कर्ज और उसका ब्याज चुकाने में स्वाहा हो रहा है। सालाना ब्याज का डंक: प्रदेश को हर साल करीब 25,000 करोड़ रुपये से ज्यादा सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज भरने के लिए देने पड़ते हैं। पूंजीगत खर्च पर कैंची: जब कमाई का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज में चला जाता है, तो लोक निर्माण विभाग (PWD), जल निगम और सेतु निर्माण जैसी बुनियादी एजेंसियों के बिल अटकने लगते हैं। नतीजा यह कि ठेकेदार काम धीमा कर देते हैं और नई स्वीकृत सड़कों के टेंडर कागजों में ही अटके रह जाते हैं। सीमित वर्ग को नकद लाभ, खामियाजा भुगत रहा पूरा प्रदेश राजनीतिक नफे-नुकसान के तराजू पर तौली गई प्रत्यक्ष लाभ (DBT) योजनाओं का बोझ अब खुलकर सामने आ रहा है। अकेले ‘लाडली बहना’ योजना पर साल के करीब 18,000 से 19,000 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके साथ मुफ्त बिजली और अन्य नकद सब्सिडी को जोड़ लिया जाए, तो यह आंकड़ा 30,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच जाता है। जमीनी हकीकत यह है कि इन योजनाओं का सीधा नकद लाभ एक तय वर्ग तक पहुंच रहा है, लेकिन इसकी कीमत हर उस आम नागरिक को चुकानी पड़ रही है जो: पेट्रोल-डीजल पर भारी वैट दे रहा है। टूटी सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाकर हर महीने मेंटेनेंस का नुकसान झेल रहा है। सीवेज, शुद्ध पेयजल और बेहतर सरकारी अस्पतालों के लिए तरस रहा है। चमकते शहरों में उड़ती धूल: कैसे बनेगा ‘स्मार्ट एमपी’? राजधानी भोपाल हो या प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर—स्मार्ट सिटी के चमचमाते विज्ञापनों और होर्डिंग्स के ठीक नीचे धूल का गुबार उड़ता साफ देखा जा सकता है। अधूरी पड़ी रिंग रोड्स, लटके हुए फ्लाईओवर्स और गड्ढों में तब्दील प्रमुख मार्ग यह साफ बयां करते हैं कि राज्य की प्राथमिकता ‘दीर्घकालिक पूंजीगत निर्माण’ से फिसलकर ‘तात्कालिक लोकलुभावन खर्चों’ की तरफ झुक चुकी है। अर्थशास्त्र का बुनियादी नियम है कि सड़क, पुल और उद्योग से भविष्य की आय बनती है, जबकि बिना उत्पादन के बांटी गई नकद राशि केवल कर्ज का पहाड़ खड़ा करती है। बड़ा सवाल: उधारी से घी पीने का यह दौर कब तक? मध्य प्रदेश आज उस दोराहे पर खड़ा है जहां एक तरफ वोटों को साधने वाली सब्सिडी की मजबूरी है, तो दूसरी तरफ पूरी तरह हांफता हुआ आधारभूत ढांचा। यदि वक्त रहते इस अनियंत्रित कर्ज और अनुत्पादक खर्च पर ब्रेक नहीं लगा, तो आने वाली पीढ़ियां केवल ब्याज चुकाती रह जाएंगी और ‘स्मार्ट मध्य प्रदेश’ का सपना गड्ढों और धूल के बीच ही कहीं गुम होकर रह जाएगा। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Post navigation आपकी थाली में परोसे जा रहे ‘धीमे जहर’ के खिलाफ 700 किमी पैदल चला एक शख्स, पर साथ देने वाली ‘जनता’ कहां गायब है? पतंजलि गाय का घी जांच में मिला असुरक्षित, मध्य प्रदेश में पूरे बैच को बाजार से हटाने के आदेश