​नई दिल्ली:

​अगर कोई राजनीतिक रैली हो, किसी धर्म या जाति पर विवाद हो, तो सड़कों पर हजारों-लाखों का हुजूम उतर आता है। लेकिन जब बात 140 करोड़ भारतीयों की रोजाना की थाली, उनके बच्चों की सेहत और खाने में मिलाए जा रहे ‘धीमे जहर’ की आई—तो पूरी दिल्ली की सड़कों पर सिर्फ एक शख्स अकेला संघर्ष करता दिखा।

​राजस्थान के बीकानेर से करीब 700 किलोमीटर पैदल चलकर राजधानी दिल्ली पहुंचे दम्मित गहलोत (Damit Gahlot) आज एक कड़वी हकीकत का सामना कर रहे हैं। उनका मुकाबला सिर्फ फूड माफिया या लचर सिस्टम से नहीं, बल्कि उस ‘लाचार जनता’ की बेरुखी से भी है जिसके हक के लिए वे अपनी जान दांव पर लगाए बैठे हैं।

​700 किमी का सफर, 8 दिन का अनशन और साथ सिर्फ परिवार

​बीकानेर की तपती सड़कों से दिल्ली के जंतर-मंतर तक 700 किलोमीटर की दूरी नापने वाले दम्मित गहलोत ने सिर्फ पानी के सहारे आमरण अनशन शुरू किया था। उनके साथ धरने पर बैठी हैं सिर्फ उनकी पत्नी और उनका मासूम बेटा।

​भूख और थकान से उनका शरीर कमजोर पड़ चुका है, वजन गिर रहा है, और राजधानी की पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से लेकर बंगला साहिब तक कई बार हिरासत में ले चुकी है। लेकिन जिस दिल्ली में हर रोज लाखों लोग पैकेज्ड और मिलावटी खाना खाकर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं, उसी शहर से उनके साथ खड़े होने के लिए मुट्ठी भर लोग भी जमीन पर नहीं उतरे।

​मांगें किसी एक की नहीं, हर घर की रसोई की हैं

​दम्मित गहलोत अपने किसी निजी फायदे के लिए नहीं लड़ रहे। उनकी 12-सूत्रीय मांगों की सूची सीधे हर आम भारतीय के जीवन से जुड़ी है:

  1. ​मिलावटखोरों पर गैर-जमानती धाराएं: नकली दूध, पनीर, मसाले और तेल बनाने वाले माफियाओं के खिलाफ सख्त कानून बने।
  2. ​हानिकारक रंगों पर रोक: बच्चों के खाने-पीने की चीजों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे खतरनाक सिंथेटिक रंगों (Artificial Colours) पर तुरंत बैन लगे।
  3. ​मातृभाषा में लेबल: पैकेट के पीछे बारीक अंग्रेजी में छुपे केमिकल्स और इंग्रीडिएंट्स की जानकारी हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में छापना अनिवार्य हो।
  4. ​FSSAI की जवाबदेही: खाद्य सुरक्षा विभाग और अधिकारियों के औचक निरीक्षण और नियमित टेस्टिंग का दायरा बढ़े।

​सरकारी आंकड़े खुद गवाही देते हैं कि संसद में पेश रिपोर्ट के अनुसार जांचे गए करीब 18% फूड सैंपल मानकों पर फेल पाए जाते हैं। यानी हर पांचवें पैकेट में कुछ न कुछ गड़बड़ है। इसके बावजूद, इस जहर के खिलाफ सड़क पर सिर्फ एक इंसान बैठा है।

​सोशल मीडिया पर ‘क्रांति’, लेकिन जमीन पर सन्नाटा

सोशल मीडिया पर दमित के वीडियोज पर लाखों लाइक्स, शेयर्स और “भाई तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं” जैसे कमेंट्स की बाढ़ है। लेकिन जब उस संघर्ष का हिस्सा बनने की बारी आई, तो डिजिटल भीड़ अपने कमरों में सिमट गई।

​यह दृश्य सवाल खड़े करता है कि आखिर एक समाज के तौर पर हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? क्या हम अस्पताल के लाखों रुपये के बिल भरने को तैयार हैं, लेकिन शुद्ध खाने की मांग करने वाले एक अकेले इंसान के बगल में 10 मिनट खड़े होने की फुर्सत किसी के पास नहीं है?

​दम्मित गहलोत ने अनशन शुरू करते हुए कहा था, “अगर फूड माफिया से लड़ते हुए मेरी जान भी चली जाए, तो मुझे गर्व होगा।” लेकिन यह बात हर उस नागरिक के लिए शर्म का विषय होनी चाहिए, जो अपनी और अपने बच्चों की सेहत की लड़ाई भी किसी एक अकेले इंसान के भरोसे छोड़ कर तमाशा देख रहा है।

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