नई दिल्ली: राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच कांग्रेस पार्टी ने स्पष्ट किया है कि उसका रुख आज भी धार्मिक एकता, आपसी भाईचारे और देश के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की नीति पर आधारित है। पार्टी का मानना है कि सभी नागरिकों की भावनाओं का सम्मान करने के लिए ही इस गीत के केवल शुरुआती 2 छंद गाने की परंपरा रखी गई है।

धार्मिक एकता के लिए 2 छंदों का निर्णय क्यों?

 सर्वधर्म समभाव और प्राकृतिक वंदना: गीत के पहले 2 छंदों (सुजलाम् सुफलाम्…) में केवल भारत भूमि के प्राकृतिक सौंदर्य, नदियों, वनों और फसलों की सराहना की गई है। इसमें किसी विशेष देवी-देवता का उल्लेख नहीं है, जिससे देश का हर नागरिक—चाहे वह हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई हो—बिना किसी धार्मिक आपत्ति के पूरे गर्व के साथ इसे गा सकता है।

 भेदभाव और विवाद से बचाव: गीत के बाकी 4 छंदों में मातृभूमि का वर्णन हिंदू देवी-देवताओं (जैसे मां दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती) के स्वरूप में किया गया है। चूंकि इस्लाम और ईसाई धर्म जैसी एकेश्वरवादी परंपराओं में केवल एक ईश्वर की ही उपासना की जाती है, इसलिए इन छंदों से अन्य धार्मिक समुदायों में असहजता या भेदभाव की भावना न आए, इसे ध्यान में रखा गया।

 1937 का ऐतिहासिक फैसला: देश के स्वतंत्रता संग्राम के समय पंडित जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद और सुभाष चंद्र बोस की समिति ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर यह निर्णय लिया था। उद्देश्य यही था कि आज़ादी की लड़ाई में देशभक्ति का यह गीत किसी एक धर्म तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोए रखे।

कांग्रेस का संदेश:

कांग्रेस का कहना है कि भारत विविधताओं से भरा देश है। देश की असली ताकत सभी धर्मों का सम्मान और आपसी सौहार्द है। इसी एकता को मजबूत रखने के लिए पार्टी आज भी पहले 2 छंदों को गाने के फैसले को सही और संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के अनुरूप मानती है।

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