बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक खबर तेजी से वायरल हो रही है। दावा किया जा रहा है कि एस्सेल (Essel) ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा को NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) ने बड़ी राहत दी है और उनका 22,000 करोड़ रुपये का कर्ज मात्र 6.5 करोड़ रुपये में सेटल कर दिया गया है। इस खबर को सुनकर आम जनता हैरान है। लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या बैंकों ने अपना 99.9% पैसा ऐसे ही छोड़ दिया? लेकिन जो बात सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है, वह पूरी तरह सच नहीं है। यह सिर्फ आधा सच है जिसे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर यह पूरा मामला क्या है और बैंकों के पैसों की वसूली का असली सच क्या है। यह लोन सुभाष चंद्रा का नहीं, बल्कि कंपनियों का था सबसे पहली और बड़ी गलतफहमी यह है कि 22,000 करोड़ रुपये सुभाष चंद्रा ने अपने निजी इस्तेमाल के लिए लिए थे। असलियत में यह लोन एस्सेल ग्रुप की कई कंपनियों (जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर और मीडिया प्रोजेक्ट्स) ने लिया था। सुभाष चंद्रा इन कंपनियों के मालिक होने के नाते केवल एक ‘पर्सनल गारंटर’ (Personal Guarantor) थे। इसका सीधा सा मतलब है कि उन्होंने कंपनियों के लोन की गारंटी ली थी, लोन उनके निजी बैंक खाते में नहीं गया था। फिर 6.5 करोड़ रुपये में फैसला क्यों हुआ? जब कोई कंपनी लोन नहीं चुका पाती है, तो बैंक उस कंपनी के साथ-साथ पर्सनल गारंटर के खिलाफ भी NCLT में जाते हैं। भारत के दिवालिया कानून (IBC) के नियम कहते हैं कि पर्सनल गारंटर से केवल उतनी ही रकम की वसूली की जा सकती है, जितनी उसकी कुल निजी संपत्ति (Personal Net Worth) हो। कोर्ट द्वारा नियुक्त रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल ने जब सुभाष चंद्रा की निजी संपत्तियों (जैसे उनके नाम के बैंक बैलेंस, कार, और निजी एसेट्स) की जांच की, तो उसकी कुल वैल्यू लगभग 6.5 करोड़ रुपये ही निकली। सुभाष चंद्रा ने कानून का पालन करते हुए अपनी यह पूरी निजी संपत्ति बैंकों को सौंपने का प्रस्ताव रखा, क्योंकि उनके नाम पर इसके अलावा कोई और संपत्ति नहीं थी। बैंकों ने इस सेटलमेंट को क्यों माना? IBC कानून के मुताबिक, अगर 75% कर्जदाता (बैंक) किसी रीपेमेंट प्लान को मान लेते हैं, तो कोर्ट उसे पास कर देता है। इस मामले में 80.81% बैंकों ने इस प्लान के पक्ष में वोट किया। बैंकों को कानूनी तौर पर यह अच्छी तरह पता था कि सुभाष चंद्रा की निजी संपत्ति इस 6.5 करोड़ से ज्यादा नहीं है। इसलिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बजाय, बैंकों ने जो निजी संपत्ति मिल रही थी उसे लेकर ‘पर्सनल गारंटी’ वाले हिस्से को खत्म करना सही समझा। सबसे बड़ा सवाल: क्या बैंकों का 22,000 करोड़ रुपये डूब गया? इसका जवाब है- बिल्कुल नहीं। NCLT के इस फैसले से सिर्फ और सिर्फ सुभाष चंद्रा की ‘पर्सनल गारंटी’ की जिम्मेदारी खत्म हुई है। जिन कंपनियों के नाम पर यह लोन लिया गया था, उन पर यह कर्ज आज भी पूरी तरह लागू है। यह लोन माफ नहीं हुआ है। बैंक अपना पैसा वसूलने के लिए उन कंपनियों की संपत्तियों, फैक्ट्रियों, जमीनों और गिरवी रखे शेयरों की नीलामी करेंगे। यानी रिकवरी की प्रक्रिया रुकी नहीं है, वह कंपनियों के स्तर पर आगे भी पूरी सख्ती से चलती रहेगी। एस्सेल ग्रुप ने पहले भी चुकाया है भारी कर्ज सुभाष चंद्रा की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि उनकी नीयत कर्ज लेकर भागने की कभी नहीं रही। एस्सेल ग्रुप ने जनवरी 2019 से लेकर अब तक अपने कई बिजनेस, प्रोजेक्ट्स और शेयर बेचकर बैंकों का लगभग 43,000 करोड़ रुपये का लोन वापस किया है। कुल मिलाकर, 22,000 करोड़ रुपये के कर्ज के बदले 6.5 करोड़ रुपये का सेटलमेंट सिर्फ एक व्यक्ति की निजी संपत्ति से जुड़ा मामला है। इसे पूरे लोन की माफी समझना पूरी तरह गलत है। असली कर्जदार वो कंपनियां हैं, और कानून के तहत बैंक उन कंपनियों से पैसा वसूलने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। सोशल मीडिया पर चल रही ‘लोन माफी’ की बातें केवल कानूनी जानकारी के अभाव का नतीजा हैं। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Post navigation भारतीय रिजर्व बैंक में बड़ा फेरबदल: पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक एस. सोमनाथ को मिली सेंट्रल बोर्ड में जगह, तकनीकी और आर्थिक नीतियों पर पड़ेगा असर