अहमदाबाद । गुजरात: अहमदाबाद के रामोल-वस्त्राल रोड पर शनिवार को एक पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण धमाके ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। इस हादसे में 9 बेकसूर लोगों की जान चली गई, जिनमें मासूम बच्चे भी शामिल थे। पुलिस जांच में साफ हुआ कि इस फैक्ट्री का लाइसेंस पहले ही रद्द किया जा चुका था, फिर भी यह मौत का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा था। इस दिल दहला देने वाली घटना के बाद हर नागरिक के मन में एक ही तीखा सवाल उठ रहा है—”जब ये फैक्ट्रियां सिर्फ नुकसान करती हैं, प्रदूषण फैलाती हैं और मासूमों की जान लेती हैं, तो सरकार इन्हें हमेशा के लिए पूरी तरह बैन क्यों नहीं कर देती?” आइए जानते हैं कि आखिर क्यों चाहकर भी इन ‘जहर की फैक्ट्रियों’ पर मुकम्मल ताला नहीं लग पाता और इसके पीछे क्या मजबूरियां या कमियां हैं: 1. 8 लाख परिवारों की रोजी-रोटी का संकट पटाखा उद्योग को पूरी तरह बंद न कर पाने के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक है। भारत में, खासकर तमिलनाडु के शिवकाशी जैसे इलाकों में, करीब 8 लाख से ज्यादा मजदूर सीधे तौर पर इस उद्योग से जुड़े हैं। इनमें से ज्यादातर बेहद गरीब और अशिक्षित हैं, जिन्हें बारूद के अलावा दूसरा कोई काम नहीं आता। सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर इसे रातों-रात पूरी तरह बैन कर दिया गया, तो इन लाखों परिवारों के सामने भुखमरी की नौबत आ जाएगी। जब तक इन्हें रोजगार का दूसरा विकल्प नहीं मिलता, तब तक मुकम्मल बैन लगाना प्रशासन के लिए गले की फांस बना हुआ है। 2. ‘टोटल बैन’ से बढ़ता है अवैध और खतरनाक कालाबाजारी का खेल जानकारों और कानून विशेषज्ञों का मानना है कि किसी चीज पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से वह खत्म नहीं होती, बल्कि उसका अवैध बाजार (Black Market) शुरू हो जाता है। अगर वैध फैक्ट्रियां बंद कर दी गईं, तो मांग पूरी करने के लिए लोग छिपकर, घरों में, तंग गलियों में या खेतों में और भी ज्यादा खतरनाक तरीके से पटाखे बनाने लगेंगे। अहमदाबाद का हादसा इसका जीता-जागता उदाहरण है; वहां लाइसेंस रद्द होने के बाद भी चोरी-छिपे काम चल रहा था। पूरी तरह बैन होने के बाद ऐसे अवैध अड्डों को ट्रैक करना और भी मुश्किल हो जाएगा। 3. सिर्फ कागजों पर कार्रवाई और जमीन पर ढीली निगरानी सबसे बड़ी कमी हमारे सिस्टम की निगरानी (Monitoring) में है। जब किसी फैक्ट्री का लाइसेंस रद्द होता है, तो विभाग सिर्फ फाइलों पर कार्रवाई करके बैठ जाता है। जमीनी स्तर पर जाकर फैक्ट्रियों को सील क्यों नहीं किया जाता? पुलिस और स्थानीय प्रशासन की नाक के नीचे सालों-साल बारूद का यह अवैध खेल कैसे चलता रहता है? जब तक भ्रष्टाचार और ढीली निगरानी पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक कोई भी नियम इन हादसों को नहीं रोक पाएगा। क्या है इसका सही समाधान? जनता का यह कहना बिल्कुल सही है कि “किसी भी रोजगार या परंपरा की कीमत इंसानी जान से बड़ी नहीं हो सकती।” लेकिन इस समस्या को खत्म करने के लिए सरकार को दो मोर्चों पर सख्त कदम उठाने होंगे: मजदूरों का पुनर्वास (Rehabilitation): सरकार को एक निश्चित समय सीमा तय करके इस उद्योग में लगे मजदूरों को दूसरे सुरक्षित उद्योगों (जैसे टेक्सटाइल या मैन्युफैक्चरिंग) में शिफ्ट करना चाहिए और उन्हें ट्रेनिंग देनी चाहिए। लाइसेंस रद्द यानी तुरंत जेल: नियमों का उल्लंघन करने वाली या अवैध रूप से पटाखा बनाने वाली फैक्ट्रियों के मालिकों पर सीधे ‘गैर-इरादतन हत्या’ का केस दर्ज होना चाहिए और उनके अड्डों को तुरंत जमींदोज कर देना चाहिए। जब तक सरकारें इन दोनों मोर्चों पर इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगी, तब तक कागजी बैन बेअसर साबित होते रहेंगे और बेकसूर लोग इन ‘जहर की फैक्ट्रियों’ की भेंट चढ़ते रहेंगे। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Post navigation सोनम वांगचुक को सादी वर्दी और सफेद चादर में ले गई पुलिस, जनता से क्या छुपाने की थी कोशिश? सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाने पर बवाल: क्या 20 जुलाई के ‘संसद चलो’ मार्च से डर गई सरकार?