कोलकाता | पश्चिम बंगाल:

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों अंदरूनी खींचतान चरम पर है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी TMC (Trinamool Congress) के कई चुने हुए नेता, विधायक और सांसद धीरे-धीरे पार्टी से दूरी बना रहे हैं या बगावती तेवर दिखा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस समय तृणमूल कांग्रेस एक बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है।

लेकिन इस बीच राजनीतिक गलियारों में एक बहुत ही चौंकाने वाली चर्चा शुरू हो गई है—क्या ममता बनर्जी को अपनी ही पार्टी के अवसरवादी नेताओं को सबक सिखाने के लिए खुद ‘BJP कार्ड’ खेलना पड़ेगा?

आखिर क्यों साथ छोड़ रहे हैं TMC के नेता?

ममता बनर्जी के बेहद भरोसेमंद रहे नेताओं की नाराजगी और पार्टी छोड़ने के पीछे मुख्य रूप से 3 बड़े कारण सामने आ रहे हैं –

1 अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव: पार्टी में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का कद लगातार बढ़ रहा है। तृणमूल की पुरानी और वरिष्ठ पीढ़ी के कई नेता एक युवा नेतृत्व के तहत काम करने में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं।

2 केंद्रीय एजेंसियों (ED-CBI) का दबाव: शिक्षक भर्ती घोटाला और कोयला घोटाला जैसे मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई से कई नेता डरे हुए हैं। अपनी राजनीतिक जमीन और खुद को बचाने के लिए कई नेता सुरक्षित रास्ते की तलाश में हैं।

3 स्थानीय गुटबाजी और टिकट का डर: बंगाल के अलग-अलग जिलों में TMC के भीतर ही गुटबाजी चरम पर है। टिकट कटने के डर और स्थानीय स्तर पर तवज्जो न मिलने से नेता बगावत पर उतर आते हैं।

क्या दीदी को बोलना होगा— “मैं भी BJP के साथ हूँ”?

राजनीति के जानकारों के बीच एक बेहद दिलचस्प और आक्रामक रणनीति की चर्चा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ममता बनर्जी को अपने दल के डरपोक और अवसरवादी नेताओं को बेनकाब करना है, तो उन्हें एक बड़ा मनोवैज्ञानिक दांव चलना पड़ सकता है।

अगर दीदी खुद यह संकेत दे दें कि राजनीतिक रणनीतियों के तहत वह भी BJP के साथ खड़ी हो सकती हैं या उनके साथ जा सकती हैं, तो पूरी बाजी पलट जाएगी।

इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ से बागियों पर क्या असर होगा?

 बागियों के रास्ते बंद हो जाएंगे: जो नेता सिर्फ ED-CBI के डर से या सत्ता के लालच में BJP का दामन थामने की फिराक में रहते हैं, उनके पैर तुरंत रुक जाएंगे। जब खुद सुप्रीम लीडर ऐसा संकेत देगी, तो बागियों का राजनीतिक मोल खत्म हो जाएगा।

 वफादारी की परीक्षा: इससे यह साफ हो जाएगा कि कौन नेता विचारधारा के साथ खड़ा है और कौन सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए भाग रहा है। यह कदम पार्टी पर ममता बनर्जी की पकड़ को और मजबूत कर देगा।

एक दोधारी तलवार है यह रणनीति

हालांकि, यह रणनीति ममता बनर्जी के लिए बेहद जोखिम भरी भी हो सकती है। ‘दीदी’ की पूरी राजनीति हमेशा से BJP के कड़े विरोध और एंटी-BJP वोट बैंक पर टिकी रही है। ऐसे में ऐसा कोई भी बयान या संकेत उनके कोर वोटर्स को असमंजस में डाल सकता है।

लेकिन राजनीति में ‘साम, दाम, दंड, भेद’ का अपना महत्व है। अब देखना यह होगा कि ममता बनर्जी इन बागियों से निपटने के लिए अपनी पुरानी आक्रामक शैली अपनाती हैं, या फिर कोई ऐसा नया राजनीतिक दांव खेलती हैं जिसकी किसी ने कल्पना भी न की हो।

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