कोलकाता / नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े उलटफेर के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या राज्य में सालों से चल रहा घुसपैठ (Infiltration) का मुद्दा अब सुलझ जाएगा? चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने जिस आक्रामक तरीके से अवैध घुसपैठियों और उन्हें शह देने वाले भ्रष्ट अधिकारियों का मुद्दा उठाया था, अब सरकार में आने के बाद उस पर एक्शन लेने की बारी आ गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद अब पुलिस और स्थानीय प्रशासन का पूरा कंट्रोल नई सरकार के हाथ में है। ऐसे में कड़े प्रशासनिक फैसले देखने को मिल सकते हैं।

1. निशाने पर होंगे ‘कागज़’ बनाने वाले भ्रष्ट अधिकारी

अब तक केन्द्र सरकार और सीमा सुरक्षा बल (BSF) का आरोप रहता था कि स्थानीय प्रशासन के असहयोग के कारण बॉर्डर पार करने वाले घुसपैठियों के फर्जी आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी आसानी से बन जाते हैं।

अब राज्य सरकार के पास ‘विजिलेंस’ और ‘स्टेट सीआईडी’ (CID) जैसी ताकतें हैं। सूत्रों के मुताबिक, सीमावर्ती जिलों (Border Districts) में तैनात रहे उन अधिकारियों और कर्मचारियों की लिस्ट तैयार की जा सकती है, जिनके कार्यकाल में संदिग्ध रूप से बड़ी संख्या में नए दस्तावेज जारी किए गए। ऐसे अधिकारियों पर विभागीय जांच के साथ-साथ सीधे जेल भेजने की कार्रवाई भी हो सकती है।

2. ‘डबल इंजन’ सरकार से बढ़ेगा तालमेल

अब तक पश्चिम बंगाल पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बल (BSF) के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर अक्सर टकराव देखने को मिलता था। केन्द्र सरकार ने जब BSF का दायरा बढ़ाकर 50 किमी किया था, तब तत्कालीन राज्य सरकार ने इसका पुरजोर विरोध किया था।

लेकिन अब राज्य और केन्द्र में एक ही दल/गठबंधन की सरकार होने के कारण दोनों एजेंसियों के बीच ‘इंटेलिजेंस शेयरिंग’ (खुफिया जानकारी साझा करना) बेहद मजबूत होगी। BSF और बंगाल पुलिस मिलकर जॉइंट ऑपरेशन चला सकेंगे, जिससे मानव तस्करी और घुसपैठ के सिंडिकेट को तोड़ना आसान होगा।

3. संदिग्ध इलाकों में चल सकता है ‘वेरिफिकेशन ड्राइव’

खबरों की मानें तो सरकार उन विधानसभा और पंचायत क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे सकती है, जहां पिछले कुछ सालों में जनसंख्या का अनुपात अचानक और असामान्य रूप से बदला है। स्थानीय खुफिया इकाई (LIU) के जरिए ऐसे लोगों की पहचान की जा सकती है जिनके दस्तावेज संदिग्ध हैं। पुराने सरकारी रिकॉर्ड्स से मिलान करके फर्जी तरीके से हासिल की गई नागरिकता और सरकारी योजनाओं के लाभ को रोका जा सकता है।

राह नहीं है आसान: कानून और डिपोर्टेशन की बड़ी चुनौती

प्रशासनिक इच्छाशक्ति के बावजूद जमीन पर यह काम रातों-रात होना मुमकिन नहीं है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी कानूनी अड़चनें हैं:

 अदालती प्रक्रिया: किसी भी संदिग्ध को सीधे देश से बाहर नहीं किया जा सकता। भारतीय कानून के तहत हर व्यक्ति को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (Foreigners Tribunals) और अदालतों में अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलता है, जिसमें लंबा समय लगता है।

 बांग्लादेश का रुख: अवैध नागरिकों की पहचान होने के बाद भी उन्हें वापस बांग्लादेश भेजना एक पेचीदा अंतरराष्ट्रीय मामला है। जब तक बांग्लादेश सरकार उन्हें अपना नागरिक स्वीकार नहीं करती, तब तक उन्हें सिर्फ डिटेंशन सेंटर में ही रखा जा सकता है।

पश्चिम बंगाल में सत्ता बदलने से इस गंभीर मुद्दे पर ‘पॉलिटिकल विल’ (राजनीतिक इच्छाशक्ति) तो साफ नजर आ रही है, लेकिन लाखों की आबादी के बीच से असली और फर्जी नागरिकों की पहचान करना नई सरकार के लिए एक बड़ी प्रशासनिक परीक्षा होगी। देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़े इस संवेदनशील मामले पर अब पूरे देश की नजरें टिकी हैं।

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