नई दिल्ली/भोपाल: आज 21 जून है। दुनिया के नक्शे पर मौजूद 190 से ज्यादा देश आज एक सुर में, एक लय में ‘ओम्’ का उच्चारण कर रहे हैं और योग की विभिन्न मुद्राओं में नजर आ रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस योग को आज पूरी दुनिया एक ‘ग्लोबल फिटनेस ट्रेंड’ मान चुकी है, उसकी जड़ें कितनी गहरी हैं और इसका सफर कहाँ से शुरू हुआ था?

आइए जानते हैं भारत के उस अनमोल खजाने का इतिहास, जो आज पूरी मानवता का सुरक्षा कवच बन चुका है।

5,000 साल पुराना इतिहास: भगवान शिव से महर्षि पतंजलि तक का सफर

योग का इतिहास किसी आधुनिक थ्योरी या चंद सदियों पुराना नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के विकास के साथ जुड़ा हुआ है।

1. आदियोगी शिव: पहले गुरु

भारतीय संस्कृति और ग्रंथों के अनुसार, योग के सबसे पहले गुरु भगवान शिव हैं, जिन्हें ‘आदियोगी’ कहा जाता है। हज़ारों साल पहले हिमालय में कांति सरोवर के तट पर आदियोगी ने अपने इस गूढ़ ज्ञान को सप्तऋषियों (सात ऋषियों) को दिया था। इन ऋषियों ने इस ज्ञान को दुनिया के अलग-अलग कोनों—एशिया, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में फैलाया।

2. वेदों और उपनिषदों में प्रमाण

सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में मिली मूर्तियों और मुहरों में योग मुद्राओं के चित्र मिलते हैं। इसके अलावा हमारे सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद और बाद में उपनिषदों में योग का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

3. महर्षि पतंजलि: योग के ‘साइंटिस्ट’

योग सदियों से भारत में था, लेकिन यह बिखरा हुआ था। लगभग 2,200 साल पहले महर्षि पतंजलि ने ‘योगसूत्र’ की रचना की। उन्होंने योग को व्यवस्थित किया और ‘अष्टांग योग’ (8 अंगों वाला मार्ग) दिया, जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि शामिल हैं। इसी वजह से उन्हें आधुनिक योग का जनक माना जाता है।

भारत से ‘विश्व गुरु’ बनने का वैश्विक सफर

भारत की सीमाओं से निकलकर योग ने पूरी दुनिया पर कैसे राज किया, इसके तीन बड़े पड़ाव हैं:

 सिल्क रूट और बौद्ध भिक्षु: प्राचीन काल में भारत के बौद्ध और जैन भिक्षु जब व्यापारिक मार्गों (सिल्क रूट) से चीन, जापान, तिब्बत और श्रीलंका गए, तो वे अपने साथ योग और ध्यान (मेडिटेशन) की पद्धतियां भी ले गए।

 स्वामी विवेकानंद का वो भाषण (1893): आधुनिक दौर में योग को पश्चिम (West) तक पहुंचाने का श्रेय स्वामी विवेकानंद को जाता है। 1893 में शिकागो के विश्व धर्म संसद में उनके भाषण ने अमेरिकी लोगों को भारतीय अध्यात्म और योग का मुरीद बना दिया।

 परमहंस योगानंद और बीकेएस अयंगर: 20वीं सदी में इन गुरुओं ने पश्चिम के देशों में जाकर योग को वैज्ञानिक तरीके से सिखाया, जिससे यह विदेशों के घर-घर में पहुंच गया।

21 जून ही क्यों? संयुक्त राष्ट्र में भारत का वो ऐतिहासिक रिकॉर्ड

साल 2014 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सामने 21 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित करने का प्रस्ताव रखा था।

 177 देशों का रिकॉर्ड समर्थन: भारत के इस प्रस्ताव को दुनिया के 177 देशों ने बिना किसी हिचकिचाहट के तुरंत समर्थन दिया। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में आज तक किसी भी प्रस्ताव को इतने कम समय में इतने सारे देशों का समर्थन नहीं मिला था।

 21 जून की खास वजह: 21 जून को ‘ग्रीष्म संक्रांति’ (Summer Solstice) कहा जाता है। यह साल का सबसे लंबा दिन होता है और इस समय सूर्य की ऊर्जा सबसे ज्यादा प्रभावी होती है। भारतीय परंपरा में इसे अध्यात्म के नजरिए से बेहद शुभ माना जाता है।

 2015 में पहली शुरुआत: इसके बाद 21 जून 2015 को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया, जहाँ दिल्ली के राजपथ पर बने मुख्य कार्यक्रम ने दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए थे।

आज का सच: एक ‘सॉफ्ट पावर’ और अरबों का बिजनेस

आज योग सिर्फ साधु-संतों की गुफाओं तक सीमित नहीं है। यह भारत की सबसे मजबूत ‘सॉफ्ट पावर’ (सांस्कृतिक ताकत) बन चुका है।

 ग्लोबल इकोनॉमी: आज दुनिया भर में योग मैट, योग वियर, और वेलनेस सेंटर्स का बाजार अरबों डॉलर का हो चुका है।

 साइंस ने भी माना लोहा: आज दुनिया के बड़े से बड़े डॉक्टर्स और वैज्ञानिक मान चुके हैं कि मानसिक तनाव, डिप्रेशन, और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों (जैसे डायबिटीज, बीपी) का सबसे सटीक और बिना साइड-इफेक्ट वाला इलाज सिर्फ योग और प्राणायाम है।

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