नई दिल्ली/भोपाल। अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) से आम जनता और भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत अच्छी खबर आ रही है। अप्रैल और मई के महीने में आसमान छू रही कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें अब काफी नीचे आ चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया है।

इस गिरावट के बाद अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब कच्चा तेल इतना सस्ता हो चुका है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम कम क्यों नहीं किए जा रहे हैं? तकनीकी आंकड़ों के अनुसार, तेल कंपनियों के पास इस समय पेट्रोल-डीजल के दाम 10 से 12 रुपये प्रति लीटर तक कम करने का पूरा मौका है, लेकिन फिर भी जनता को राहत नहीं मिल रही है। आइए समझते हैं इसके पीछे का पूरा गणित।

प्रति लीटर सिर्फ 47.44 रुपये पड़ रहा है कच्चा तेल

अगर गणित को समझें, तो 1 बैरल में लगभग 159 लीटर कच्चा तेल होता है। वर्तमान में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की स्थिति को देखें, तो 80 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से भारत को कच्चा तेल सिर्फ 47.44 रुपये प्रति लीटर की मूल कीमत (Base Price) पर मिल रहा है।

 अप्रैल 2026 में कीमत: लगभग 118 डॉलर प्रति बैरल (यानी करीब 69.96 रुपये प्रति लीटर)

 मई 2026 में कीमत: लगभग 103 डॉलर प्रति बैरल (यानी करीब 61.07 रुपये प्रति लीटर)

 जून 2026 में कीमत: लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल (यानी करीब 47.44 रुपये प्रति लीटर)

अप्रैल-मई की तुलना में जून में कच्चा तेल करीब 14 से 22 रुपये प्रति लीटर तक सस्ता हो चुका है।

तो फिर जनता की जेब पर बोझ क्यों? ये हैं 3 बड़े कारण:

1. तेल कंपनियों का पुराना घाटा (Under-recoveries):

अप्रैल और मई के महीनों में जब वैश्विक कारणों से क्रूड ऑयल 118 डॉलर प्रति बैरल पार कर गया था, तब भारतीय सरकारी तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) ने देश में पेट्रोल-डीजल के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़ाए थे। उस दौरान कंपनियों को प्रति लीटर पर भारी नुकसान उठाना पड़ा था। अब जब तेल सस्ता हुआ है, तो कंपनियां सबसे पहले अपने उस पुराने घाटे (Under-recoveries) की भरपाई करने में जुटी हैं।

2. टैक्स का भारी-भरकम बोझ:

कच्चे तेल की मूल कीमत भले ही 47.44 रुपये प्रति लीटर हो, लेकिन रिफाइनरी में प्रोसेस होने के बाद इस पर केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) और राज्य सरकारों का वैट (VAT) लगता है। कई राज्यों में टैक्स की दरें इतनी ज्यादा हैं कि पेट्रोल-डीजल का बेस प्राइस कम होने के बावजूद रिटेल प्राइस (Retail Price) 100 रुपये के पार बना हुआ है। जब तक सरकारें टैक्स नहीं घटातीं, बड़ी राहत मिलना मुश्किल है।

3. प्रॉफिट मार्जिन सुधारने का खेल:

अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम कम होने पर तेल कंपनियों का मुनाफा (Profit Margin) बढ़ जाता है। कंपनियां रोज़ाना कीमतों में बदलाव करने के बजाय (Dynamic Pricing) लंबे समय तक दामों को स्थिर रखती हैं। अभी कंपनियां अपना मुनाफा बढ़ाने और बैलेंस शीट को मजबूत करने को प्राथमिकता दे रही हैं।

कब तक मिल सकती है राहत?

बाजार के जानकारों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर या उससे नीचे अगले 2 से 3 हफ्तों तक बनी रहती है, तो सरकार और तेल कंपनियों पर कीमतें घटाने का भारी दबाव बनेगा। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 3 से 5 रुपये प्रति लीटर तक की कटौती कर जनता को थोड़ी राहत दे सकती हैं।

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