कोलकाता / नई दिल्ली: कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है, और राजनीति में यह बात कुछ ज्यादा ही सटीक बैठती है। साल 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेतृत्व से बगावत कर अपनी नई राह चुनी थी और ‘तृणमूल कांग्रेस’ (TMC) की नींव रखी थी। आज, करीब तीन दशक बाद, ‘दीदी’ खुद उसी मोड़ पर खड़ी हैं जहां कभी कांग्रेस खड़ी थी।

मई 2026 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हाथों मिली करारी शिकस्त के बाद, ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITMC) अपने इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के अंदर सुलग रही बगावत की चिंगारी अब एक बड़ी राजनीतिक आग का रूप ले चुकी है।

ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में बड़ा ‘विद्रोह’: दांव पर नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी

TMC के भीतर का असंतोष तब खुलकर सामने आ गया जब पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में बागी विधायकों ने मोर्चा खोल दिया। बागी गुट का दावा है कि उन्हें चुनाव जीतकर आए 80 में से 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त है।

इतना ही नहीं, इस गुट ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) पद पर भी अपना दावा ठोक दिया है। अगर यह दावा कानूनी रूप से सही साबित होता है, तो ममता बनर्जी के हाथों से न सिर्फ पार्टी का नियंत्रण छूटेगा, बल्कि विधानसभा में आधिकारिक विपक्ष का दर्जा भी छिन सकता है।

सांसदों को बचाने दिल्ली दौड़ीं ममता बनर्जी

विधायकों की इस बगावत का असर अब दिल्ली तक दिखने लगा है। लोकसभा और राज्यसभा के तृणमूल सांसदों के बीच भी दोफाड़ होने की खबरें गर्म हैं। इस संकट को भांपते हुए ममता बनर्जी को आनन-फानन में दिल्ली का रुख करना पड़ा है।

जून 2026 में होने वाली विपक्षी ‘INDIA’ गठबंधन की बैठक में शामिल होने के बहाने, ममता का असली मिशन अपने सांसदों को एकजुट रखना और संसद में अपनी पार्टी को बिखरने से बचाना है।

डैमेज कंट्रोल: पुरानी कमेटियां भंग, नए सिरे से संगठन की कवायद

इस बगावत को कुचलने और अपने वफादारों को एकजुट रखने के लिए ममता बनर्जी ने बड़ा कदम उठाया है:

 संगठन भंग: पार्टी की सभी पुरानी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय कमेटियों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया है।

 नया फेरबदल: ‘दीदी’ संगठन में बड़ा फेरबदल कर के उन चेहरों को आगे ला रही हैं जो संकट की इस घड़ी में उनके साथ वफादार खड़े हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है: > “ममता बनर्जी ने हमेशा एक फाइटर की तरह राजनीति की है। लेकिन इस बार चुनौती बाहरी नहीं, बल्कि अंदरूनी है। जिन नेताओं को उन्होंने खुद सींचा, आज वही उनकी राजनीतिक जमीन खिसका रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या दीदी इस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाती हैं या नहीं।”

क्या बिखर जाएगी तृणमूल?

पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए यह समय बेहद संवेदनशील है। एक तरफ जहां बीजेपी राज्य में अपनी सरकार बनाकर मजबूत हो रही है, वहीं दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल TMC ताश के पत्तों की तरह बिखरती नजर आ रही है। क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी को इस सबसे बड़े बिखराव से बचा पाएंगी? यह आने वाले कुछ हफ्ते तय कर देंगे।

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