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नई दिल्ली: देश के करोड़ों छात्रों और युवाओं का भविष्य दांव पर लगा है, लेकिन पेपर लीक का अंतहीन सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। संसद से लेकर चुनावी मंचों तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 3 सालों (2023 से लेकर 2026 तक) में लगभग 10 बार परीक्षा में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कड़े कानून और सख्त कार्रवाई की बात कह चुके हैं। सरकार भारी शोर-शराबे के बीच ‘The Public Examinations Act, 2024’ भी लेकर आई।

लेकिन आज देश का युवा सीधे सवाल पूछ रहा है—इतने भाषणों, दावों और नए कानूनों के बावजूद धरातल पर नतीजा ‘शून्य’ क्यों है? आखिर क्यों पेपर लीक माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि सरकार बेबस नजर आ रही है? और सबसे बड़ा सवाल—इतने सालों में इस माफिया के बड़े आकाओं को कड़ी सजा क्यों नहीं मिली?

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3 साल, 10 भाषण… लेकिन इंसाफ का इंतजार क्यों?

साल 2023 से लेकर अब 2026 आ चुका है। इन 3 सालों में जब भी कोई बड़ी परीक्षा (जैसे NEET या UGC-NET) विवादों में आई, सरकार की तरफ से बड़े-बड़े आश्वासन दिए गए। खुद पीएम मोदी ने संसद के भीतर भी खड़े होकर भरोसा दिलाया कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

लेकिन हकीकत यह है कि इन 3 सालों में सिर्फ भाषणों का आंकड़ा बढ़ा है, सजा का नहीं। कानून की किताबें तो मोटी कर दी गईं, लेकिन जब बात इस काले धंधे के असली मास्टरमाइंड्स को जेल की सलाखों के पीछे भेजने की आती है, तो पूरा सिस्टम सुस्त पड़ जाता है।

माफिया को किसका संरक्षण? कौन दबा रहा है कार्रवाई की फाइलें?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा अंदेशा यह उठ रहा है कि आखिर इस माफिया को किसका संरक्षण प्राप्त है? कौन है जो अंदरखाने सरकार या जांच एजेंसियों की रफ्तार को धीमा करने की कोशिश कर रहा है?

 सफेदपोशों और रसूखदारों का जाल: पेपर लीक का धंधा कोई आम अपराधी नहीं चलाते। यह अरबों रुपये का संगठित सिंडिकेट है, जिसमें बड़े-बड़े कोचिंग संचालक, रसूखदार अधिकारी और राजनीतिक रसूख रखने वाले लोग शामिल होते हैं।

 दबाव का खेल: आरोप लग रहे हैं कि जब भी जांच की आंच इस सिंडिकेट के ‘बड़े चेहरों’ तक पहुंचती है, तो परदे के पीछे से दबाव का खेल शुरू हो जाता है। यही कारण है कि छोटे-मोटे प्यादे और नकल करने वाले छात्र तो पकड़े जाते हैं, लेकिन पेपर बेचने वाले असली मगरमच्छ हमेशा साफ बच निकलते हैं।

कड़ा कानून सिर्फ कागजों पर? क्यों नहीं हो रही त्वरित सजा?

2024 में जो कानून पास हुआ, उसमें 10 साल की जेल और 1 करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन 2026 तक आते-आते भी इस कानून के तहत किसी बड़े माफिया किंगपिन को ऐसी सजा नहीं दी जा सकी है जो पूरे देश के लिए एक नजीर (Example) बने।

 फास्ट ट्रैक कोर्ट की कमी: जब तक इन मामलों के लिए स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर 3 से 6 महीने के भीतर सजा तय नहीं की जाएगी, तब तक माफियाओं में कानून का कोई खौफ नहीं होगा।

 ढीली पैरवी: जांच एजेंसियों द्वारा कोर्ट में मजबूत चार्जशीट दाखिल करने और केस को अंजाम तक पहुंचाने में सालों लग जाते हैं, जिसका सीधा फायदा इन अपराधियों को जमानत मिलने के रूप में होता है।

भाषण नहीं, अब दोषियों को जेल देखना चाहता है देश

अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। 3 साल का लंबा वक्त बीतने और बार-बार कानून का हवाला दिए जाने के बाद भी अगर पेपर लीक की घटनाएं कम होने के बजाय बढ़ रही हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक नाकामी है। देश का युवा अब केवल कड़े शब्दों या आश्वासनों से मानने वाला नहीं है। वक्त आ गया है कि सरकार बिना किसी दबाव के, इस माफिया तंत्र को दबाने वाले असली चेहरों को बेनकाब करे और उन्हें ऐसी ऐतिहासिक सजा दे, जिससे आगे कोई ऐसा दुस्साहस न कर सके।

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