देश में एक बार फिर नीट (NEET) का पेपर रद्द होने से लाखों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है। हर साल सामने आने वाले पेपर लीक के मामलों ने सिस्टम की नाकामी और राजनीतिक पार्टियों की नीयत पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

• कल अचानक रद्द हुई नीट परीक्षा, लाखों छात्रों के सपनों पर फिरा पानी।

• हर साल पेपर लीक की खबरें, आखिर क्यों शिक्षा माफियाओं के आगे बेबस है सरकार?

• क्या युवाओं का दर्द नेताओं के लिए सिर्फ वोट बैंक और सरकार बनाने का जरिया है?

नई दिल्ली: देश में मेडिकल की पढ़ाई का सपना देखने वाले लाखों छात्रों के साथ एक बार फिर बड़ा धोखा हुआ है। कल जैसे ही नीट (NEET) का पेपर रद्द होने की खबर सामने आई, देशभर के छात्रों और उनके माता-पिता में निराशा और गुस्सा छा गया। 2024 के भयंकर पेपर लीक विवाद के बाद उम्मीद थी कि सिस्टम सुधरेगा, लेकिन कल परीक्षा के अचानक कैंसिल होने से यह साफ हो गया है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी भी माफियाओं के चंगुल में है।

कल क्या हुआ और क्यों टूटा भरोसा?

परीक्षा की तैयारी के लिए छात्र 2-3 साल तक दिन-रात एक कर देते हैं। परिवार अपनी गाढ़ी कमाई कोचिंग और हॉस्टल में लगा देता है। लेकिन परीक्षा के ऐन वक्त पर जब पेपर रद्द होने की खबर आती है, तो यह सिर्फ एक परीक्षा का रद्द होना नहीं होता, बल्कि लाखों परिवारों की उम्मीदों का टूटना होता है। सवाल यह है कि डिजिटल इंडिया के इस दौर में, जहां हर चीज हाई-टेक है, वहां देश की सबसे बड़ी परीक्षा का पेपर सुरक्षित क्यों नहीं रखा जा सकता?

हर साल पेपर लीक, आखिर सरकार इतनी बेबस क्यों?

चाहे साल 2015 हो, 2021 हो, 2024 का सबसे बड़ा विवाद हो या अब कल का यह नया मामला। कहानी हर साल एक जैसी ही रहती है। ‘सॉल्वर गैंग’ और शिक्षा माफिया चंद रुपयों के लिए पूरे सिस्टम को हैक कर लेते हैं। NTA जैसी बड़ी संस्थाएं पूरी तरह नाकाम साबित होती हैं।

सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि सरकारें इतने सख्त कानून बनाने के वादे करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर शिक्षा माफियाओं का बाल भी बांका नहीं होता। सरकारें जांच के आदेश देती हैं, कुछ अधिकारियों के तबादले कर दिए जाते हैं, लेकिन कुछ ही महीनों बाद वही खेल फिर शुरू हो जाता है। ऐसे में जनता का यह सोचना बिल्कुल जायज है कि क्या सरकार इन माफियाओं के सामने पूरी तरह लाचार और बेबस हो चुकी है?

क्या राजनीति सिर्फ कुर्सी पाने का खेल है?

इस पूरे मुद्दे का सबसे कड़वा सच हमारी राजनीति है। जब भी कोई पेपर लीक होता है या परीक्षा रद्द होती है, तो विपक्षी पार्टियां तुरंत सड़क पर उतर आती हैं। बड़े-बड़े आंदोलन होते हैं और ऐसा दिखाया जाता है जैसे नेताओं को युवाओं के भविष्य की सबसे ज्यादा फिक्र है।

लेकिन सच्चाई क्या है? सच्चाई यह है कि जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं या सत्ता बदलती है, यही नेता इन मुद्दों को भूल जाते हैं। जो लोग विपक्ष में रहकर छात्रों के हक की आवाज उठाते हैं, सत्ता में आते ही उसी भ्रष्ट सिस्टम को बचाने में लग जाते हैं। इससे यह साफ नजर आता है कि सड़क पर होने वाले आंदोलन और राजनीतिक पार्टियों का विरोध सिर्फ सरकार बनाने, कुर्सी हथियाने और युवाओं को अपना ‘वोट बैंक’ बनाने के लिए होता है।

अब आगे क्या?

युवाओं को अब यह समझना होगा कि उनके भविष्य की लड़ाई उन्हें खुद लड़नी होगी। जब तक इन शिक्षा माफियाओं को जड़ से खत्म नहीं किया जाता और परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की 100 प्रतिशत जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक कल की तरह आगे भी परीक्षाएं रद्द होती रहेंगी।

आपकी क्या राय है?

क्या आपको लगता है कि कभी इस देश में बिना किसी गड़बड़ी और पेपर लीक के परीक्षाएं हो पाएंगी? क्या नेता सच में छात्रों के साथ हैं या यह सिर्फ एक राजनीतिक स्टंट है? 

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