भोपाल/मध्य प्रदेश:

अगर आपको कोर्ट में किसी केस के दौरान वॉट्सएप चैट, कोई वीडियो या कॉल रिकॉर्डिंग सबूत के तौर पर पेश करनी है, तो अब आपको अपना मोबाइल फोन महीनों तक कोर्ट या पुलिस के पास जमा नहीं करना पड़ेगा। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इसके लिए ‘इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स रूल्स- 2026’ का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है और इसे राज्य सरकार को भेज दिया है। जल्द ही इसकी अधिसूचना जारी होने वाली है। अगर यह नियम लागू होता है, तो मध्य प्रदेश ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बन जाएगा।

नए आपराधिक कानून (BNSS की धारा 105) लागू होने के बाद डिजिटल सबूतों की अहमियत बहुत बढ़ गई है। इसी को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने डिजिटल सबूतों को पेश करने की प्रक्रिया को ज्यादा सुरक्षित और आसान बनाया है।

आम आदमी को मिलने वाली 5 बड़ी सहूलियतें:

1 मोबाइल नहीं, अब सर्टिफिकेट से चलेगा काम: डिजिटल सबूत पेश करने के लिए अब आपको अपनी डिवाइस (मोबाइल या लैपटॉप) जमा नहीं करनी होगी। आप एक तय सर्टिफिकेट के साथ अपना सबूत पोर्टल पर अपलोड करेंगे। अपलोड होते ही आपको एक यूनिक आईडी मिलेगी और आप अपना फोन वापस ले जा सकेंगे।

2 ‘पैकेज फाइल’ बनेगी पक्का सबूत: जब आप सबूत अपलोड करेंगे, तो सिस्टम उसकी एक ‘हैश वैल्यू’ (डिजिटल फिंगरप्रिंट), यूनिक आईडी और समय दर्ज करेगा। इन सबको मिलाकर एक ‘पैकेज फाइल’ बनेगी, जिसे कोर्ट मूल सबूत (Original Evidence) मानेगा।

3 छेड़छाड़ करना होगा नामुमकिन: डिजिटल सबूत में अगर कोई एक कॉमा (,) या डॉट (.) भी बदलेगा, तो उसकी ‘हैश वैल्यू’ तुरंत बदल जाएगी। इससे यह साफ पता चल जाएगा कि सबूत के साथ किसी ने छेड़छाड़ की है।

4 ई-सेवा केंद्र से आसानी से अपलोड: लोग या उनके वकील जिला कोर्ट के ई-सेवा केंद्रों या ऑथोराइज्ड सेंटर्स से इन डिजिटल सबूतों को आसानी से अपलोड कर सकेंगे। (ध्यान रहे: अगर कोई जानबूझकर फालतू या केस से बाहर का डेटा अपलोड करेगा, तो उस पर जुर्माना भी लग सकता है)।

5 पीड़िताओं की पहचान रहेगी पूरी तरह गुप्त: यौन अपराधों से जुड़े मामलों में डिजिटल सबूत सामान्य पोर्टल पर नहीं डाले जाएंगे। ऐसे सबूतों की कॉपी देने की बजाय कोर्ट सिर्फ अपने सामने उन्हें देखने (निरीक्षण) की परमिशन देगा, ताकि पीड़िता की निजता (Privacy) बनी रहे।

पुलिस की मनमानी पर कैसे लगेगी रोक?

 महीनों तक फोन जब्ती से छुटकारा: अक्सर देखा जाता है कि पुलिस किसी मामूली वॉट्सएप चैट या एक छोटे से वीडियो क्लिप के लिए भी जांच के नाम पर लोगों के फोन जब्त कर लेती है। कई बार फोन को फॉरेंसिक जांच के नाम पर महीनों तक थाने में धूल खानी पड़ती है। नए नियम आने के बाद, पुलिस बिना वजह आपका फोन अपने पास नहीं रख पाएगी।

 निजता (Privacy) का हनन रुकेगा: जब पुलिस आपका पूरा फोन रख लेती है, तो आपके पर्सनल फोटो, बैंकिंग डिटेल और अन्य निजी जानकारी भी उनके हाथ में होती है। कई बार इसका गलत इस्तेमाल होने का डर रहता है। अब आप सिर्फ वही डेटा (पैकेज फाइल) देंगे जो केस से जुड़ा है, जिससे आपकी प्राइवेसी बची रहेगी।

 डेटा डिलीट या छेड़छाड़ का डर खत्म: कई मामलों में पुलिस या जांच एजेंसियों पर सबूतों के साथ छेड़छाड़ के आरोप लगते हैं। नए सिस्टम में ‘हैश वैल्यू’ तकनीक होने से, एक बार सबूत पोर्टल पर अपलोड हो गया, तो पुलिस भी उसमें कोई बदलाव नहीं कर पाएगी।

 वसूली और दबाव की राजनीति पर लगाम: फोन जब्त करने का डर दिखाकर पुलिस कई बार आम लोगों या गवाहों पर दबाव बनाती है। अब गवाह ई-सेवा केंद्र जाकर सीधे कोर्ट के पोर्टल पर अपना डिजिटल सबूत सुरक्षित तरीके से दर्ज करा सकेंगे, जिससे पुलिस का यह ‘हथियार’ काम नहीं करेगा।

कुल मिलाकर ‘इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स रूल्स- 2026’ डिजिटल युग में न्याय प्रणाली को तेज और पारदर्शी बनाने की तरफ एक बहुत बड़ा और शानदार कदम है। इससे आम आदमी का कोर्ट और कानून पर भरोसा और भी मजबूत होगा।

error: Content is protected !!