जो सड़कें 1 से 3 साल पहले ही 72 करोड़ रुपए में बनी थीं और अभी गारंटी पीरियड में हैं, उन्हें ठेकेदार से सुधरवाने के बजाय सरकार उन पर 140 करोड़ रुपए दोबारा खर्च करने जा रही है।

भोपाल । मध्य प्रदेश:

मध्य प्रदेश में सड़क निर्माण के नाम पर सरकारी खजाने को कैसे चूना लगाया जा रहा है, इसका एक बड़ा मामला सामने आया है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो प्रदेश में भ्रष्टाचार कभी खत्म नहीं होगा बल्कि और बढ़ेगा। मामला लोक निर्माण विभाग (PWD) का है, जहां जिन सड़कों का मेंटेनेंस ठेकेदार को अपने पैसों से करना था, उनके लिए विभाग ने नई तकनीक के नाम पर फिर से करोड़ों का बजट पास कर दिया।

प्रदेश में ‘व्हाइट टॉपिंग’ (White Topping) तकनीक से 41 नई सड़कें बनाई जा रही हैं। इन पर कुल 288 करोड़ रुपए का खर्च आना है। लेकिन सबसे हैरानी की बात यह है कि इन 41 सड़कों में से 19 सड़कें ऐसी हैं, जो सिर्फ 1 से 3 साल पहले ही बनी थीं।

 इन 19 सड़कों को बनाने में तब 72 करोड़ रुपए खर्च हुए थे।

 नियम के मुताबिक ये सड़कें अभी 3 से 5 साल की ‘परफॉर्मेंस गारंटी’ (Performance Guarantee) में हैं।

 अब इन्हीं सड़कों को व्हाइट टॉपिंग से दोबारा बनाने के लिए 140 करोड़ रुपए का नया बजट तैयार कर लिया गया है।

कैसे बढ़ रहा है भ्रष्टाचार?

नियम यह कहता है कि अगर कोई सड़क गारंटी पीरियड में टूटती है या खराब होती है, तो उसे सुधारने की पूरी जिम्मेदारी उसी ठेकेदार की होती है जिसने उसे बनाया था। इसके लिए टेंडर की 5 प्रतिशत राशि (Deposit) विभाग के पास जमा रहती है।

लेकिन यहां विभाग के अधिकारियों ने ठेकेदार से काम करवाने के बजाय, एक नया प्रपोजल तैयार कर लिया। अगर ठेकेदारों को यह पता चल जाए कि खराब काम करने के बाद भी उन्हें सड़क सुधारनी नहीं पड़ेगी और सरकार नया टेंडर निकाल देगी, तो इससे घटिया निर्माण और भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलेगा।

विभाग का क्या तर्क है?

अधिकारियों का तर्क है कि पुरानी सड़कों पर गड्ढे हो गए थे और पानी भरने से ट्रैफिक में दिक्कत हो रही थी। उनका कहना है कि व्हाइट टॉपिंग तकनीक से बनी सड़कें 20 साल तक चलेंगी। गारंटी वाले ठेकेदार के बारे में उनका कहना है कि उसकी जमा राशि में से कुछ पैसा काट लिया गया है। लेकिन सवाल यह है कि जब सड़क की गारंटी थी, तो नई तकनीक के नाम पर 140 करोड़ का अतिरिक्त बोझ जनता के टैक्स पर क्यों डाला जा रहा है?

शासन ने दिए सख्ती और जांच के निर्देश

मामला जब शासन की नजर में आया तो हड़कंप मच गया। PWD के डिप्टी सेक्रेटरी एआर सिंह ने साफ कहा है कि यह नियमों के बिल्कुल खिलाफ है।

 इस मामले में ईएनसी (ENC) केपीएस राणा, संबंधित अधीक्षण यंत्री और कार्यपालन यंत्री के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।

 इनमें भोपाल, इंदौर और ग्वालियर संभाग की वो मुख्य सड़कें शामिल हैं, जिनका डामरीकरण पिछले साल ही हुआ था।

 अकेले भोपाल में डीआईजी बंगला से वेस्ट प्राइज, एसबीआई से कर्बला, वन विहार रोड और पत्रकार भवन से व्यापम चौराहे तक की सड़कों पर यह काम होना है।

यह मामला दिखाता है कि कैसे सिस्टम की कमियों का फायदा उठाकर सरकारी बजट की बर्बादी की जाती है। अगर शासन समय रहते इस पर संज्ञान नहीं लेता, तो 140 करोड़ रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते। अब देखना यह है कि जांच के बाद दोषी अधिकारियों पर क्या ठोस कार्रवाई होती है।

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