भोपाल/दतिया: मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। साल 2020 में कांग्रेस की सरकार गिराने और ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ विधायकों को बीजेपी में लाकर भाजपा की सरकार बनवाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को बड़ा झटका लगा है। भाजपा आलाकमान ने 30 जुलाई को होने वाले दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया है और उनकी जगह संगठन के नेता आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा है।

इस फैसले के बाद दतिया में नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों में भारी आक्रोश है। बीजेपी के जिला अध्यक्ष से लेकर कई पार्षदों ने इस्तीफे दे दिए हैं और सड़कों पर चक्काजाम जैसी स्थिति बन गई है। ऐसे में हर कोई यही सवाल पूछ रहा है कि आखिर इतने कद्दावर नेता का टिकट क्यों काटा गया? क्या नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक करियर खत्म हो रहा है, या फिर यह उनके समर्थकों की किसी गलती का परिणाम है?

इस बड़े राजनीतिक फैसले के पीछे की असली इनसाइड स्टोरी:

1. क्या नरोत्तम मिश्रा राजनीति से रिटायर हो रहे हैं?

बिल्कुल नहीं। नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना उनके राजनीति से संन्यास लेने का संकेत नहीं है, बल्कि यह भाजपा के ‘नए नेतृत्व’ को आगे बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात के बाद नरोत्तम मिश्रा ने खुद अपने समर्थकों से शांत रहने और पार्टी के फैसले का सम्मान करने की अपील की है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी उन्हें संगठन में या राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी जिम्मेदारी देने पर विचार कर रही है।

2. ग्राउंड रिपोर्ट का नकारात्मक फीडबैक

टिकट कटने के पीछे सबसे बड़ा कारण क्षेत्र से मिला ग्राउंड फीडबैक बताया जा रहा है। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा बेहद कम वोटों (लगभग 3,000) के अंतर से जीते थे। इसके बाद, साल 2023 के मुख्य चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने उन्हें 7,700 से अधिक वोटों से हरा दिया था। (हालांकि, राजेंद्र भारती को बैंक धोखाधड़ी मामले में सजा होने के बाद यह सीट खाली हुई है)। पार्टी के आंतरिक सर्वे में सामने आया कि दतिया की जनता और स्थानीय संगठन में एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का असर था, जिसके चलते पार्टी ने नया चेहरा उतारने का जोखिम उठाया।

3. समर्थकों का हंगामा और अंदरूनी गुटबाजी

नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों ने जिस तरह हाईवे जाम किया और पुलिस से झड़प की, उसने आलाकमान को और सख्त कर दिया। राजनीति के जानकारों का मानना है कि समर्थकों का यह आक्रामक रवैया नरोत्तम मिश्रा के हक में जाने के बजाय उनके खिलाफ चला गया। इसके अलावा, भोपाल से लेकर दिल्ली तक यह चर्चा भी थी कि अगर नरोत्तम मिश्रा यह उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचते, तो वे दोबारा कैबिनेट मंत्री पद के बड़े दावेदार होते। इससे राज्य सरकार और संगठन के मौजूदा समीकरणों में बदलाव आ सकता था, जिससे बचने के लिए भी पार्टी ने एक नए और संगठनात्मक पृष्ठभूमि (RSS) के चेहरे आशुतोष तिवारी को चुना।

राजनीति में कोई भी फैसला स्थाई नहीं होता। साल 2020 में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने वाले नरोत्तम मिश्रा के लिए यह समय भले ही राजनीतिक रूप से कठिन हो, लेकिन इसे उनका ‘अस्त’ मानना जल्दबाजी होगी। बीजेपी की यह नई रणनीति दतिया में कितनी कामयाब होती है, यह 3 अगस्त को आने वाले चुनावी नतीजे ही तय करेंगे।

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