नई दिल्ली: देश में एक बार फिर आंदोलनों और अनशन का दौर जारी है। NEET पेपर लीक मामले और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर सोनम वांगचुक और छात्रों का प्रदर्शन दिल्ली में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बीच, सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक पुरानी घटना की खूब चर्चा हो रही है। लोग साल 2011 के उस दौर को याद कर रहे हैं जब अन्ना हजारे के अनशन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संकट को सुलझाने के लिए तुरंत सर्वदलीय बैठक (All-Party Meeting) बुला ली थी।

ऐसे में जनता के मन में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि जो कदम 2011 में यूपीए सरकार ने उठाया था, वैसा ही कदम आज की मौजूदा सरकार या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्यों नहीं उठा रहे हैं? आइए समझते हैं इसके पीछे के 3 बड़े प्रशासनिक और रणनीतिक कारण:

1. मांग के स्वरूप में बड़ा अंतर (कानून बनाम इस्तीफा)

 2011 का दौर: अन्ना हजारे की मांग किसी व्यक्ति या मंत्री के खिलाफ नहीं थी, बल्कि वे ‘जन लोकपाल बिल’ नामक एक नया कानून बनाने की मांग कर रहे थे। भारतीय लोकतंत्र में कोई भी कानून अकेले सरकार नहीं बना सकती, उसके लिए संसद और सभी राजनीतिक दलों की सहमति जरूरी होती है। इसीलिए तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी ताकि संसद का रुख साफ हो सके।

 2026 का दौर: आज सोनम वांगचुक और प्रदर्शनकारी छात्रों की मुख्य मांग शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और परीक्षा प्रणाली में प्रशासनिक सुधार है। किसी मंत्री का इस्तीफा या प्रशासनिक बदलाव पूरी तरह से कार्यपालिका (Executive) और सरकार का अंदरूनी राजनीतिक फैसला होता है। इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की संवैधानिक जरूरत नहीं होती।

2. सरकारों की कार्यशैली और गठबंधन की राजनीति

 मनमोहन सिंह सरकार (गठबंधन का दबाव): 2011 में देश में यूपीए की गठबंधन सरकार थी। सरकार में शामिल सहयोगी दलों और मजबूत विपक्ष के दबाव के कारण सरकार को हर बड़े मुद्दे पर आम सहमति बनानी पड़ती थी। जन-आंदोलन के आगे सरकारें जल्दी बातचीत की टेबल पर आने की रणनीति अपनाती थीं।

 मोदी सरकार (मजबूत नेतृत्व की शैली): मौजूदा एनडीए सरकार की कार्यशैली अलग है। यह सरकार किसी बाहरी आंदोलन या प्रदर्शन के सीधे दबाव में आकर तुरंत झुकने या हड़बड़ी में फैसले लेने से बचती है। सरकार का मानना होता है कि सीधे पीएम स्तर पर बैठक करने से आंदोलनकारियों का राजनीतिक दबाव और बढ़ सकता है। इसलिए वे सीधे पीएम की बजाय विभागीय मंत्रियों या अधिकारियों के जरिए ‘बैकचैनल’ (पर्दे के पीछे) बातचीत करना पसंद करते हैं।

3. बातचीत का तरीका बदला, बातचीत बंद नहीं हुई

ऐसा नहीं है कि सरकार इस आंदोलन को पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है। खबरों के मुताबिक, सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों (जैसे जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह) ने सोनम वांगचुक से मुलाकात की है और छात्रों की मांगों को लेकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिशें जारी हैं। सरकार का रुख यह है कि संसद के भीतर इस विषय पर चर्चा कराई जाए, न कि संसद के बाहर कोई अलग से सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए।

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