छतरपुर, मध्य प्रदेश : मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में विकास की कीमत स्थानीय आदिवासियों और किसानों को अपनी पुश्तैनी जमीन देकर चुकानी पड़ रही है। छतरपुर जिले में केंद्र सरकार की बहुचर्चित ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ (विशेषकर ढोडन बांध) के खिलाफ भड़का आक्रोश अब एक बड़े जनांदोलन का रूप ले चुका है। विस्थापन की तलवार लटकने से खौफजदा 24 गांवों के ग्रामीणों ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है, जिसके चलते बांध का निर्माण कार्य पूरी तरह से रुक गया है। प्रदर्शनकारी महिलाओं की हुंकार “हमें 12 लाख का झुनझुना नहीं चाहिए। हम अपनी जमीन और जंगल छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। सरकार या तो हमें उचित न्याय दे, या फिर यहीं हमारी चिता जला दे।” विवाद की मुख्य जड़ क्या है? जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन में आदिवासियों की मुख्य रूप से तीन बड़ी शिकायतें हैं: 1. मुआवजे का मज़ाक: सरकार विस्थापित होने वाले हर परिवार को 12.5 लाख रुपये का मुआवजा दे रही है। लेकिन ग्रामीणों का तर्क है कि आज के समय में इतनी कम रकम से न तो घर बनाया जा सकता है और न ही रोजगार मिल सकता है। उनकी मांग है कि परिवार के हर बालिग सदस्य को अलग इकाई माना जाए और उन्हें रहने के लिए विकसित जमीन दी जाए। 2. फर्जी कागजी कार्रवाई: ग्रामीणों का सबसे गंभीर आरोप यह है कि प्रशासन ने परियोजना को पास कराने के लिए कागजों पर फर्जी ग्राम सभाएं दिखाई हैं। जमीन अधिग्रहण के लिए उनकी वास्तविक सहमति कभी नहीं ली गई। 3. राशन-पानी रोकने का आरोप: प्रदर्शनकारियों का कहना है कि गांव खाली करवाने के लिए प्रशासन हथकंडे अपना रहा है। दबाव बनाने के लिए कथित तौर पर उनका राशन और पानी तक रोका जा रहा है। आंदोलन के वे तरीके, जिन्होंने प्रशासन की नींद उड़ा दी इस विरोध प्रदर्शन ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा है क्योंकि ग्रामीणों ने गांधीवादी लेकिन बेहद सख्त तरीके अपनाए हैं: • चिता आंदोलन: यह विरोध का सबसे दर्दनाक और उग्र रूप है। ढोडन बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों की महिलाओं ने लकड़ियों की प्रतीकात्मक चिताएं बनाई हैं और कफन ओढ़कर उस पर लेट गई हैं। • जल और माटी सत्याग्रह: कड़कड़ाती ठंड की परवाह किए बिना, किसान केन नदी के पानी में घंटों खड़े रहकर ‘जल सत्याग्रह’ कर रहे हैं। साथ ही, अपनी मिट्टी की कसम खाकर अपनी जमीन न छोड़ने का संकल्प ले रहे हैं। • सामूहिक ‘चूल्हा बंद’: प्रशासन के रवैये से नाराज कई गांवों ने अन्न-जल का त्याग कर दिया है। घरों में खाना नहीं पक रहा है और पूरा गांव सामूहिक भूख हड़ताल पर बैठा है। पुलिस-प्रशासन और ग्रामीणों के बीच टकराव हालात तब और बिगड़ गए जब पुलिस और प्रशासन की टीम ने ‘चिता आंदोलन’ को जबरन खत्म कराने और चिताओं को हटाने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारी महिलाओं के बीच तीखी झड़प हुई। भारी जनाक्रोश को देखते हुए प्रशासन को बैरंग लौटना पड़ा। केन-बेतवा लिंक परियोजना, जो बुंदेलखंड के सूखे को खत्म करने के लिए लाई गई थी, अब अपने ही लोगों के आंसुओं का कारण बन रही है। फिलहाल इलाके में भारी पुलिस बल तैनात है और तनावपूर्ण शांति बनी हुई है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इस गतिरोध को बलपूर्वक कुचलती है या बातचीत के जरिए कोई मानवीय समाधान निकालती है। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Post navigation रायसेन रिंग रोड की मंजूरी बनी डॉ. प्रभुराम चौधरी की बड़ी जीत, सड़क बनी तो क्षेत्र में और बढ़ेगा राजनीतिक कद भीषण गर्मी के कारण स्कूलों का समय बदला, अब सुबह 7:30 से 12:00 बजे तक लगेंगी कक्षाएं