बंगाल में CM मोहन यादव: लाडली बहना vs लक्ष्मी भंडार का महासंग्राम कोलकाता/भोपाल : आज 2 अप्रैल 2026 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में उतर चुके हैं। बीजेपी ने उन्हें एक बड़े ‘स्टार प्रचारक’ के रूप में वहां भेजा है। लेकिन इस बार का चुनावी अखाड़ा कुछ अलग है, क्योंकि यहां लड़ाई सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि ‘योजनाओं’ की भी है। क्या एमपी के सीएम बंगाल की जनता का मन बदल पाएंगे? आइए इस दिलचस्प राजनीतिक ड्रामे को समझते हैं। योजनाओं की टक्कर: ‘लाडली बहना’ vs ‘लक्ष्मी भंडार’ राजनीति का असली खेल यहीं से शुरू होता है। मोहन यादव अपनी रैलियों में मध्य प्रदेश की सुपरहिट ‘लाडली बहना’ योजना का ढिंढोरा पीट रहे हैं। लेकिन बंगाल की जनता और विपक्ष भली-भांति जानते हैं कि यह योजना असल में ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना की ही एक तरह से कॉपी है। अब मोहन यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना है कि भले ही आइडिया बंगाल का हो, लेकिन बीजेपी का उसे लागू करने का तरीका (मॉडल) ममता बनर्जी की सरकार से कहीं ज्यादा बेहतर, पारदर्शी और असरदार है। वे यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि बीजेपी शासित राज्यों में विकास की रफ्तार ज्यादा तेज है। बंगाल में क्यों भेजे गए मोहन यादव? (बीजेपी का मास्टरप्लान) • हिंदी भाषी और यादव वोट बैंक: पश्चिम बंगाल के आसनसोल, हावड़ा और कोलकाता के कई हिस्सों में यूपी, बिहार और एमपी के लाखों लोग रहते हैं। एक यादव और हिंदी भाषी मुख्यमंत्री होने के नाते, बीजेपी को उम्मीद है कि मोहन यादव इस वोट बैंक को अपनी तरफ खींच लेंगे। • कट्टर हिंदुत्व की छवि: बंगाल में ध्रुवीकरण (पोलराइजेशन) एक बड़ा मुद्दा है। मोहन यादव की छवि एक सख्त और बड़े फैसले लेने वाले नेता की है, जो वहां के खास वोटर्स को काफी पसंद आ सकती है। क्या हैं सीएम के सामने बड़ी चुनौतियां? • ममता का ‘बाहरी’ कार्ड: टीएमसी (TMC) की सबसे बड़ी रणनीति यही रहती है कि वे दूसरे राज्यों से आने वाले बीजेपी नेताओं को ‘बाहरी’ बताकर बंगाल के लोगों की भावनाओं से खेलते हैं। मोहन यादव को इस ‘बाहरी’ वाले ठप्पे से बचना होगा। • भाषा की दीवार: बंगाल के गांवों में आज भी लोग सिर्फ बंगाली समझते हैं। ऐसे में हिंदी में दिए गए भाषण का असर उस गहराई तक नहीं पहुंच पाता, जितना किसी लोकल नेता का पहुंचता है। डॉ. मोहन यादव का यह दौरा बीजेपी के लिए एक बड़ा दांव है। वे वहां के हिंदी भाषी वोटर्स में नई ऊर्जा जरूर भरेंगे, लेकिन क्या वे ‘लक्ष्मी भंडार’ वाली ममता दीदी के सामने अपनी ‘लाडली बहना’ का जादू चला पाएंगे? यह देखना सबसे ज्यादा दिलचस्प होगा। चुनाव का अंतिम नतीजा तो तभी बदलेगा जब जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता भी उतनी ही मेहनत करेंगे। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Post navigation केरल में दांव पर ‘सत्ता की चाबी’! LDF, UDF और NDA के बड़े वादे, क्या इस बार बदलेगा इतिहास? बंगाल चुनाव 2026: मालदा में चुनाव अधिकारियों पर हमला बना TMC की मुसीबत ,क्या इस बार बलि चढ़ेगी दीदी की कुर्सी ?