कोलकाता:

पश्चिम बंगाल में ईद-उल-अजहा (बकरीद) से पहले एक बेहद चौंकाने वाली और नई स्थिति बन गई है। देश में अक्सर गाय को लेकर अलग तरह की राजनीति देखने को मिलती है, लेकिन बंगाल के मवेशी बाजारों में तस्वीर एकदम उल्टी है। यहां के हिंदू किसान और पशुपालक खुद परेशान हैं और मांग कर रहे हैं कि मुस्लिम खरीदार ईद के लिए उनकी गाय खरीदें।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि किसान अपनी गाय बेचने के लिए प्रदर्शन करने को मजबूर हो गए? आइए इस पूरी खबर का विश्लेषण करते हैं:

1. रोजी-रोटी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

बंगाल के कई ग्रामीण इलाकों में मवेशी पालन एक बड़ा बिजनेस है। बहुत से हिंदू किसान और पशुपालक साल भर अपनी गायों और मवेशियों को अच्छे से चारा खिलाकर पालते हैं। उनका मुख्य लक्ष्य होता है कि बकरीद के समय मवेशी बाजार में इन्हें बेचकर अच्छी कमाई की जा सके। यह साल भर की उनकी मेहनत और रोजी-रोटी का सबसे बड़ा जरिया होता है।

2. क्यों नहीं बिक रही हैं गाय?

विवाद की शुरुआत सरकार के एक नए नियम से हुई, जिसमें कहा गया कि 14 साल से कम उम्र की और स्वस्थ गायों की कुर्बानी नहीं दी जा सकती। वहीं, इस्लाम के नियमों के अनुसार किसी बीमार, अपाहिज या बूढ़े जानवर की कुर्बानी नहीं दी जा सकती। इस नियम के कारण मुस्लिम धर्मगुरुओं ने विवाद से बचने के लिए समाज से अपील की कि वे इस साल गाय न खरीदें।

3. बाजार में सन्नाटा और किसानों का दर्द

मुस्लिम समुदाय ने जैसे ही गाय खरीदना बंद किया, बंगाल के बड़े-बड़े मवेशी बाजार (Cattle Markets) पूरी तरह ठप हो गए। हिंदू किसान अपने अच्छे और स्वस्थ जानवर लेकर बाजार में खड़े हैं, लेकिन वहां कोई खरीदार नहीं आ रहा है।

4. भारी आर्थिक नुकसान और प्रदर्शन

गाय न बिकने की वजह से मवेशी पालने वाले किसानों को करोड़ों रुपये का सीधा नुकसान हो रहा है। प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है कि उन्होंने बैंक से लोन लेकर और अपनी जमा-पूंजी लगाकर ये जानवर पाले थे। अगर ये जानवर अभी नहीं बिकेंगे, तो वे अपना कर्ज कैसे चुकाएंगे और परिवार का पेट कैसे पालेंगे? इसी आर्थिक दबाव और व्यापार ठप होने के कारण किसान सड़कों पर उतरकर विरोध कर रहे हैं।

यह पूरा मामला साफ दिखाता है कि गांवों की अर्थव्यवस्था में धर्म से कहीं ज्यादा अहमियत व्यापार और रोजी-रोटी की होती है। मवेशी बाजार में खरीदार (मुस्लिम) और बेचने वाले (हिंदू किसान) एक-दूसरे पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। खरीदार के पीछे हटने से सबसे बड़ा नुकसान उत्पादक यानी किसान को ही उठाना पड़ रहा है।

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