दतिया। मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के चौंकाने वाले नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी में खलबली मचा दी है। कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह से बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी की 6,016 वोटों से हुई हार के तुरंत बाद बीजेपी प्रदेश नेतृत्व ने कड़ा एक्शन लेते हुए दतिया जिला कार्यकारिणी को भंग कर दिया।

इस बड़ी कार्रवाई के बाद अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस हार की आंच बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा तक भी पहुंचेगी?

राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी सूत्रों की मानें तो दतिया की हार केवल एक सीट गंवाने का मामला नहीं है, बल्कि इसके तार पार्टी के अंदरूनी गुटबाज़ों और असंतोष से जुड़े हैं:

 टिकट कटने पर समर्थकों का भारी विरोध: नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद नरोत्तम समर्थकों ने सड़कों पर जमकर विरोध प्रदर्शन किया था। इस बगावत ने चुनाव से पहले ही बीजेपी के पक्ष में बने माहौल को कमजोर कर दिया था।

 पारंपरिक बूथों पर करारी हार (भीतरघात की आशंका): दतिया के जिन बूथों को नरोत्तम मिश्रा का मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां भी बीजेपी पिछड़ गई। पार्टी आलाकमान इसे सीधे तौर पर निष्क्रियता और ‘भीतरघात’ के रूप में देख रहा है।

 प्रचार के बावजूद जमीनी नाकामी: हालांकि नरोत्तम मिश्रा ने सार्वजनिक मंचों से आशुतोष तिवारी के समर्थन में प्रचार किया, लेकिन दतिया में उनके खास कार्यकर्ताओं का उदासीन रवैया चुनाव परिणामों में साफ नजर आया।

प्रदेश बीजेपी ने उपचुनाव में हुई हार की विस्तृत समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। सूत्रों के मुताबिक, समिति की रिपोर्ट के आधार पर बड़े नेताओं पर भी गाज गिर सकती है:

 समीक्षा कमेटी इस बात की बारीकी से जांच कर रही है कि स्थानीय बड़े नेताओं ने प्रचार में कितना सहयोग किया और उनके समर्थक कार्यकर्ताओं का रुख कैसा रहा।

जांच रिपोर्ट आने तक या उसके आधार पर केंद्रीय नेतृत्व नरोत्तम मिश्रा को प्रदेश व केंद्र के अहम संगठनात्मक पदों से दूर रख सकता है।

 दतिया की पूरी जिला कार्यकारिणी भंग करके पार्टी ने यह साफ संदेश दिया है कि अनुशासनहीनता और भीतरघात पर कोई रियायत नहीं दी जाएगी, चाहे नेता कितना भी बड़ा क्यों न हो।

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