दतिया/मध्य प्रदेश। दतिया उपचुनाव को लेकर सियासी पारा अपने चरम पर पहुंच गया है, लेकिन चुनावी टिकट की इस दौड़ ने अब एक नया और विवादित मोड़ ले लिया है। वरिष्ठ भाजपा नेता नरोत्तम मिश्रा को लेकर चल रही खींचतान और उनके समर्थकों द्वारा किए गए चक्काजाम, तोड़फोड़ व बाजार बंद की घटनाओं ने देश भर में एक नई बहस छेड़ दी है। अनुशासन का दम भरने वाली भाजपा की इस आंतरिक कलह और उग्र प्रदर्शन से जहां एक तरफ पार्टी की किरकिरी हो रही है, वहीं दतिया की जनता भी इस तरीके से बेहद नाराज है।

जनता का तीखा सवाल: जनता को परेशान करके कैसी समाजसेवा?

दतिया के स्थानीय नागरिकों और सोशल मीडिया पर लोग अब खुलकर इस हिंसक और आक्रामक राजनीति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। आम जनता के बीच कुछ बड़े सवाल तैर रहे हैं:

 आम आदमी और व्यापारियों को परेशानी: उपचुनाव में टिकट के दावे के लिए जबरन मार्केट बंद कराने और चक्काजाम करने से सबसे ज्यादा मार छोटे व्यापारियों और रोज कमाने-खाने वाले मजदूरों पर पड़ी है।

 जनसेवा का मुखौटा या कुर्सी की चाह?: लोगों का सीधा सवाल है कि अगर राजनीति में आने का मकसद सिर्फ दतिया का विकास और जनता की सेवा करना है, तो उसके लिए विधायकी का पद ही क्यों जरूरी है? टिकट न मिलने पर इस तरह कानून-व्यवस्था को हाथ में लेना साफ तौर पर यह दिखाता है कि यह जनसेवा के बहाने सिर्फ ‘सत्ता का लालच’ है।

देशभर में पार्टी की किरकिरी, संगठन के अनुशासन पर सवाल

दतिया उपचुनाव के ठीक पहले हुई इस अनुशासनहीनता ने भाजपा आलाकमान की चिंताएं बढ़ा दी हैं। देश भर के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि पार्टी के इतने वरिष्ठ नेता के क्षेत्र में कार्यकर्ताओं का यह रूप भाजपा की छवि को बट्टा लगा रहा है। विपक्ष को भी उपचुनाव से ठीक पहले भाजपा को ‘गुटबाजी और अनुशासनहीनता’ के मुद्दे पर घेरने का सीधा मौका मिल गया है।

हालांकि, समर्थकों का कहना है कि यह गुस्सा नरोत्तम मिश्रा का नहीं, बल्कि दतिया के उन कार्यकर्ताओं की भावनाओं का विस्फोट है जो अपने नेता को दोबारा चुनावी मैदान में देखना चाहते हैं।

उपचुनाव में भारी पड़ सकता है जनता का यह आक्रोश

लोकतंत्र में जनता सब कुछ देखती और समझती है। दतिया की जागरूक जनता अब यह तय करने का मन बना रही है कि जो नेता या समर्थक अपने राजनीतिक फायदे के लिए शहर की शांति भंग कर सकते हैं, वे भविष्य में उनके कितने सगे होंगे। उपचुनाव के इस संवेदनशील मोड़ पर कार्यकर्ताओं का यह उग्र रवैया पार्टी के लिए फायदे की जगह बड़ा नुकसान साबित हो सकता है। अब देखना होगा कि संगठन इस गुटबाजी से कैसे निपटता है।

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