उज्जैन/भोपाल: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार पर उज्जैन में बड़े पैमाने पर जमीन खरीदने को लेकर छिड़ा सियासी घमासान थमता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और विपक्ष के अन्य नेता लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्यमंत्री के इस्तीफे और जांच की मांग कर रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सीएम बनने के बाद उनके परिवार ने प्रभाव का इस्तेमाल कर करोड़ों की जमीनें खरीदीं।

लेकिन, क्या वाकई इन आरोपों से मुख्यमंत्री मोहन यादव की कुर्सी को कोई खतरा है? कानूनी और प्रशासनिक जानकारों की मानें तो इस विवाद में सीएम के फंसने के चांस बेहद कम हैं, क्योंकि परिवार का पूरा बिजनेस कागजी और कानूनी तौर पर बेहद मजबूत नजर आ रहा है।

1. कोई ‘शॉर्टकट’ नहीं, सब कुछ ऑन-रिकॉर्ड और लीगल

विपक्ष भले ही इसे “महाकाल की जमीन की लूट” का नाम दे रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन जमीनों की खरीद में किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं दिखता।

 पारदर्शी ट्रांजैक्शन: खरीदी गई सभी 168 एकड़ जमीनों (137 प्लॉट) की बकायदा सरकारी रजिस्ट्री की गई है और स्टांप ड्यूटी चुकाई गई है,लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि पुरानी और नई जमीनों को मिलाकर उनके परिवार के पास अब कुल जमीन करीब 335 एकड़ (245 प्लॉट) हो चुकी है।

 व्हाइट मनी का इस्तेमाल: जमीनों का भुगतान कैश में न होकर बैंक ट्रांजैक्शन (चेक/RTGS) के जरिए हुआ है। कानूनन, जब तक पैसे का स्रोत (Source of Income) वैध है, तब तक किसी भी भारतीय नागरिक को जमीन खरीदने से नहीं रोका जा सकता।

2. पुराना पारिवारिक बिजनेस: ‘सीएम’ होने से व्यापार पर रोक नहीं

मोहन यादव के समर्थकों और कानूनी जानकारों का तर्क है कि यादव परिवार कोई नया-नया प्रॉपर्टी डीलर नहीं बना है। उनका परिवार साल 2010 से ही रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन के बिजनेस में सक्रिय है।

देश का कानून किसी भी मुख्यमंत्री के परिवार को उनका पुराना और वैध पारिवारिक व्यवसाय जारी रखने से नहीं रोकता। चूंकि उनके बेटे और पत्नी स्वतंत्र कानूनी इकाइयां (Legal Entities) हैं, इसलिए उनके द्वारा किए गए व्यावसायिक फैसलों के लिए मुख्यमंत्री को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

3. मास्टर प्लान और प्रोजेक्ट्स: पहले से तय थी रूपरेखा

कांग्रेस का सबसे बड़ा आरोप यह है कि जिन इलाकों में सरकार के प्रोजेक्ट्स आने वाले हैं, वहीं जमीनें क्यों खरीदी गईं? इस पर प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ (2028) को लेकर विकास कार्यों का खाका और नए हाईवे/बायपास के रूट्स सालों पहले से तय थे। यह कोई ‘गोपनीय जानकारी’ नहीं थी, बल्कि पब्लिक डोमेन में थी। एक रियल एस्टेट कारोबारी के नाते भविष्य के विकास को भांपकर निवेश करना एक सामान्य व्यावसायिक रणनीति है, जिसे कोर्ट में ‘भ्रष्टाचार’ साबित करना नामुमकिन के बराबर है।

4. कांग्रेस के आरोपों से क्यों कुछ नहीं होने वाला?

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, कांग्रेस के आरोप केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित हैं।

 सबूतों की कमी: विपक्ष के पास केवल जमीनों की लिस्ट और उनके सरकारी प्रोजेक्ट्स के पास होने के संयोग (Coincidence) के अलावा कोई ऐसा ठोस सबूत नहीं है, जो यह साबित कर सके कि सीएम ने फाइल पर साइन करके जानबूझकर अपने परिवार को फायदा पहुंचाया।

 जांच की कानूनी सीमा: जब तक किसी सौदे में सीधे तौर पर रिश्वत, बेनामी संपत्ति या मनी लॉन्ड्रिंग (ED/CBI के दायरे में) का पुख्ता प्रमाण न हो, तब तक केवल ‘पॉलीटिकल नैरेटिव’ के दम पर सरकार को बैकफुट पर नहीं लाया जा सकता।

नैतिक बहस बड़ी, कानूनी खतरा छोटा

कुल मिलाकर, यह पूरा विवाद कानूनी से ज्यादा नैतिक (Ethical) है। विपक्ष भले ही इसे ‘हितों का टकराव’ (Conflict of Interest) बताकर जनता के बीच मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन कानूनी मोर्चे पर मुख्यमंत्री मोहन यादव का किला पूरी तरह सुरक्षित नजर आता है। यही वजह है कि बीजेपी इस मुद्दे पर पूरी तरह शांत और आश्वस्त है।

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