वाशिंगटन/तेहरान:

क्या अमेरिका घुटनों पर आ गया है? क्या दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका, अपने सबसे बड़े दुश्मन ईरान को 8 लाख करोड़ रुपये (लगभग 100 बिलियन डॉलर) का मुआवजा देने जा रहा है? सोशल मीडिया से लेकर चाय की टपरियों तक यह खबर आग की तरह फैली हुई है। लेकिन इस खबर के पीछे की हकीकत और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बदलते बयानों ने इस समय दुनिया भर के पत्रकारों और मीडिया हाउसेज के तोते उड़ा रखे हैं।

आइए समझते हैं कि इस 8 लाख करोड़ की ‘महाडील’ का सच क्या है और ट्रम्प की जुबान मीडिया के लिए सिरदर्द क्यों बन गई है।

8 लाख करोड़ का सच: मुआवजा या ईरान का अपना ही पैसा?

सबसे पहले तो यह साफ कर दें कि अमेरिका अपनी जेब से ईरान को एक ढेला भी मुआवजे के तौर पर नहीं देने वाला है। दरअसल, यह पूरा मामला “फ्रीज्ड फंड्स” (Frozen Funds) का है।

सालों से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के बैंकों में ईरान के अरबों डॉलर जब्त पड़े हैं। अगर दोनों देशों के बीच कोई समझौता होता भी है, तो अमेरिका केवल ईरान के उसी पुराने पैसे को वापस निकालने (Unfreeze करने) की इजाजत दे सकता है, वो भी सख्त शर्तों के साथ। लेकिन सोशल मीडिया के ‘ज्ञानियों’ ने इसे अमेरिका द्वारा दिया जाने वाला “मुआजवा” बताकर खबर का रायता फैला दिया है।

ट्रम्प के बयानों का ‘यू-टर्न’: सुबह कुछ, शाम को कुछ!

इस समय दुनिया भर की मीडिया के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि डोनाल्ड ट्रम्प की किस बात पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं। ट्रम्प की इस नीति को राजनीति में “मैडमैन थ्योरी” कहा जाता है, यानी जानबूझकर खुद को इतना अप्रत्याशित (Unpredictable) बना लो कि दुश्मन देश समझ ही न पाए कि आपका अगला कदम क्या होगा।

 सुबह का बयान: “हम ईरान को बर्बाद कर देंगे, हमारी सेना तैयार है।”

 दोपहर का ट्वीट: “ईरान के लोग बहुत अच्छे हैं, हम एक बेहतरीन डील करने जा रहे हैं।”

 शाम का यू-टर्न: “कोई डील नहीं होगी, प्रतिबंध और कड़े किए जाएंगे।”

इस चक्कर में बेचारे न्यूज एंकर और पत्रकार परेशान हैं कि आखिर ‘ब्रेकिंग न्यूज’ चलाएं तो कौन सी चलाएं? क्योंकि जब तक एक बयान की खबर टाइप होती है, तब तक ट्रम्प का दूसरा बिल्कुल उलट बयान सामने आ जाता है। इससे अमेरिका की साख पर तो असर पड़ ही रहा है, साथ ही अंतरराष्ट्रीय खबरों की विश्वसनीयता बनाए रखना पत्रकारों के लिए लोहे के चने चबाने जैसा हो गया है।

तो फिर खबर को सच कैसे माना जाए?

अब जिम्मेदार मीडिया ने ट्रम्प के केवल ‘बोलने’ को खबर बनाना बंद कर दिया है। किसी भी खबर को पक्का मानने के लिए अब 3 कड़े पैमानों का इस्तेमाल किया जा रहा है:

1 कागजी सबूत (Executive Orders): ट्रम्प क्या बोल रहे हैं, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि उन्होंने व्हाइट हाउस में किस फाइल पर साइन किए हैं। जब तक लिखित आदेश न आए, तब तक उसे सिर्फ ‘बयान’ माना जाता है, ‘पॉलिसी’ नहीं।

2 पेंटागन की हलचल: राष्ट्रपति भले कुछ भी कहें, लेकिन अमेरिकी सेना (पेंटागन) और खुफिया एजेंसी (CIA) जमीन पर क्या कर रही है, असली सच वहीं से निकलता है।

3 मध्यस्थ देशों का रुख: ओमान, कतर और स्विट्जरलैंड जैसे देश जो दोनों के बीच बीच-बचाव करा रहे हैं, उनके राजनयिकों से खबरों को क्रॉस-चेक किया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति की ऐसी खबरों में जब तक दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों से आधिकारिक मुहर न लग जाए, तब तक किसी भी बड़ी रकम या युद्ध के दावों को सिर्फ एक ‘सियासी पैंतरा’ ही समझा जाना चाहिए। ट्रम्प के बयानों का मजा लीजिए, लेकिन खबर पर भरोसा तभी करिए जब वो कागजों पर उतर आए!

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