पाटलिपुत्र/पटना/भोपाल: बिहार के पाटलिपुत्र स्टेशन पर छात्रों का फूटा गुस्सा, रेलवे ट्रैक पर जलती आग, पुलिस का लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले… यह तस्वीरें किसी एक राज्य या एक घटना की नहीं हैं। यह तस्वीरें बानगी हैं हमारे देश के उस प्रशासनिक ढर्रे की, जो हमेशा ‘सब कुछ लुट जाने’ या ‘पानी सिर से ऊपर गुजर जाने’ के बाद ही जागता है।

चाहे बिहार में परीक्षा देने आए परीक्षार्थियों के लिए ट्रेनों की कमी का मुद्दा हो, या देश के किसी कोने में जर्जर पुल के गिरने से बेकसूरों की मौत का मामला—सवाल वही पुराना और कड़वा है: “आखिर देश का सिस्टम किसी बड़े बवाल, हादसे या बेकसूर की मौत के बाद ही क्यों जागता है?”

पहले ‘लापरवाही’, फिर ‘तबाही’, और अंत में ‘स्पेशल ट्रेनें’!

बिहार आबकारी कांस्टेबल परीक्षा के दौरान जो कुछ भी हुआ, वह एडवांस प्लानिंग की कमी का सबसे ताजा उदाहरण है। परीक्षा कराने वाले विभाग को अच्छी तरह पता था कि कितने लाख एडमिट कार्ड जारी किए गए हैं। यह डेटा आसानी से रेलवे के साथ साझा किया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

जब छात्र जान जोखिम में डालकर ट्रेनों की छतों पर लटके, जब बवाल हुआ, पटरियां जाम हुईं और पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा, तब जाकर रेलवे ने आनंद-फानन में 16 स्पेशल ट्रेनें चलाने का फैसला किया। सवाल यह है कि जो फैसला बवाल के बाद लिया गया, वह परीक्षा से 2 दिन पहले क्यों नहीं लिया जा सकता था? क्या हमारे सिस्टम को काम करने के लिए हमेशा ‘हंगामे के ईंधन’ की जरूरत होती है?

क्यों हमेशा ‘रिएक्टिव’ मोड में रहता है हमारा प्रशासन?

विशेषज्ञों और प्रशासनिक जानकारों के मुताबिक, इस लेथार्जिक (सुस्त) रवैए के पीछे 3 सबसे बड़ी वजहें हैं:

 1. विभागों के बीच तालमेल (Co-ordination) का अकाल: हमारे देश में अलग-अलग सरकारी विभाग टापुओं की तरह काम करते हैं। परीक्षा बोर्ड, स्थानीय प्रशासन और रेलवे के बीच आपसी संवाद की इतनी भारी कमी है कि लाखों युवाओं के सड़क पर उतरने तक किसी को भनक ही नहीं लगती।

 2. व्यक्तिगत जवाबदेही (Accountability) का न होना: जब भी कोई ऐसी बड़ी चूक होती है, तो जांच कमेटियां बैठती हैं, फाइलें घूमती हैं और अंत में किसी छोटे कर्मचारी को सस्पेंड करके मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। जब तक नीतियां बनाने वाले बड़े अधिकारियों की सैलरी, प्रमोशन और नौकरी पर सीधी आंच नहीं आएगी, तब तक ‘चलता है’ वाला रवैया नहीं बदलेगा।

 3. ‘प्रोएक्टिव’ के बजाय ‘रिएक्टिव’ सोच: हमारे सिस्टम की आदत बन चुकी है कि जब तक आग नहीं लगेगी, तब तक कुआं नहीं खोदा जाएगा। आपदा प्रबंधन हो या भीड़ नियंत्रण, हमारी तैयारियां हमेशा घटना घटने के बाद की होती हैं, पहले की नहीं।

चीन और अन्य देशों से क्यों नहीं लेते सबक?

पड़ोसी देश चीन का उदाहरण हमारे सामने है, जहां ‘गौकाओ’ जैसी महा-परीक्षाओं में 1 करोड़ से ज्यादा छात्र बैठते हैं। वहां महीनों पहले से रूट मैप, स्पेशल बसें, पुलिस एस्कॉर्ट और ट्रैफिक डायवर्जन प्लान तैयार कर लिया जाता है। वहां किसी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं होती कि उसकी लापरवाही से देश की कानून-व्यवस्था दांव पर लग जाए, क्योंकि वहां सजा सीधे बर्खास्तगी और जेल है।

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