भोपाल । मध्य प्रदेश:

मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग (PWD) के इंदौर-सागर रिंग रोड प्रोजेक्ट में एक बड़े टेंडर घोटाले का मामला सामने आया है। इस मामले में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में सख्त रुख अपनाते हुए प्रभारी मुख्य अभियंता (ब्रिज) पीसी वर्मा को गंभीर वित्तीय अनियमितताओं और टेंडर प्रक्रिया में छेड़छाड़ का दोषी माना है। सरकार ने कोर्ट में स्पष्ट किया है कि वर्मा को पद से हटाना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह टेंडर में हुई बड़ी हेराफेरी के खिलाफ की गई कार्रवाई है।

हाईकोर्ट ने इस मामले (रिट पिटीशन क्रमांक 16652/2026) में सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना अंतिम फैसला सुरक्षित रख लिया है।

• प्रोजेक्ट: इंदौर-सागर रिंग रोड टेंडर।

• आरोपी अधिकारी: पीसी वर्मा, प्रभारी मुख्य अभियंता (ब्रिज)।

• फायदा पाने वाली कंपनी: मेसर्स राजेश शर्मा इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड।

• विवाद की वजह: तकनीकी बिड में ओवरराइटिंग और ऑफलाइन दस्तावेज स्वीकार करना।

कैसे हुआ टेंडर में खेल?

तकनीकी जांच समिति के मुख्य सदस्य होने के नाते पीसी वर्मा पर आरोप है कि उन्होंने टेंडर नंबर 453189 और 431977 के मूल्यांकन में भारी गड़बड़ी की। अपनी चहेती कंपनी ‘मेसर्स राजेश शर्मा इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड’ को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए ऑफलाइन दस्तावेज स्वीकार किए गए और उसे तकनीकी बिड में पास कर दिया गया। जब कोर्ट को दस्तावेज सौंपे गए, तो तकनीकी मूल्यांकन शीट में साफ तौर पर ‘ओवरराइटिंग’ (काट-छांट) पाई गई।

कैबिनेट मंत्री तक पहुंचा मामला, टेंडर हुए निरस्त

जब यह मामला राज्य स्तरीय समिति के पास पहुंचा, तो टेंडर में हुई गड़बड़ी को देखते हुए सभी टेंडरों को निरस्त कर दिया गया। इसके बाद विभाग के प्रमुख सचिव ने एक नोटशीट तैयार की, जिस पर कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह ने सर्वसम्मति से पीसी वर्मा को उनके प्रभार से हटाने की मंजूरी दी। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि पीसी वर्मा अपने पद का फायदा उठाकर इस मामले की जांच को प्रभावित न कर सकें।

सरकार का कोर्ट में जवाब: ‘अतिरिक्त प्रभार’ कोई अधिकार नहीं

विभाग के प्रमुख सचिव सुखवीर सिंह ने हाईकोर्ट में हलफनामा पेश कर बताया कि किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिए ‘अतिरिक्त प्रभार’ (Additional Charge) उसका कानूनी अधिकार नहीं है।

सरकार ने यह भी साफ किया कि मध्य प्रदेश में आरक्षण नियम 2025 का मामला कोर्ट में लंबित होने के कारण नियमित प्रमोशन रुके हुए हैं। इसी वजह से फीडर कैडर के अधिकारियों को ऊंचे पदों का अस्थायी प्रभार देना सरकार की प्रशासनिक मजबूरी है।

पहले मिल चुकी थी क्लीन चिट

दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में नए प्रभारी अधिकारी संजय मस्के द्वारा पहले क्लीन चिट भी दी जा चुकी थी। हालांकि, याचिकाकर्ता ने इन रिपोर्टों और पुराने फैसलों की वैधानिकता पर सवाल खड़े किए थे। याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकार ने साल 2004 के सर्कुलर के नियमों को अनदेखा कर के प्रभार सौंपे हैं।

फिलहाल, इस पूरे मामले में टेंडर दस्तावेजों में हुई छेड़छाड़ के पक्के सबूत कोर्ट के सामने रखे जा चुके हैं और अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं।

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