रायसेन, 16 मार्च 2026

मध्य प्रदेश के रायसेन में ऐतिहासिक किले पर रमजान के महीने में तोप चलाने का विवाद अब एक बड़ा रूप ले चुका है। सालों से चली आ रही इस प्रथा और प्रशासन के ‘कथित धार्मिक भेदभाव’ के खिलाफ आज सनातन समाज सड़कों पर उतर रहा है। राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक (Nationally Protected Monument) के नियमों की अनदेखी को लेकर आज शहर में एक बड़ा और शांतिपूर्ण मौन प्रदर्शन किया जाएगा।

आज दोपहर 3:30 बजे रामलीला मैदान में जुटेंगे लोग

वायरल हो रहे मैसेज और आयोजकों की अपील के अनुसार, आज (16 मार्च) दोपहर 3:30 बजे रायसेन के रामलीला मैदान में हिंदू समाज और धर्मप्रेमी नागरिक बड़ी संख्या में एकत्रित होंगे। इस विरोध प्रदर्शन की सबसे खास बात यह है कि यह पूरी तरह से ‘मौन’ और ‘शांतिपूर्ण’ रहेगा।

सनातन समाज के लोग बिना किसी शोर-शराबे के प्रशासन को एक ज्ञापन (Memorandum) सौंपेंगे। इस ज्ञापन में मुख्य रूप से यह मांग की जाएगी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नियमों का पालन करते हुए, रायसेन किले के 100 मीटर के दायरे में तोप का संचालन तुरंत प्रभाव से बंद किया जाए।

क्या है ‘धार्मिक भेदभाव’ का आरोप?

इस पूरे विवाद का मुख्य कारण प्रशासन का वह ‘दोहरा नियम’ है, जिस पर हिंदू संगठन कड़े सवाल उठा रहे हैं। रायसेन किले के परिसर में ही एक प्राचीन ‘सोमेश्वर महादेव मंदिर’ मौजूद है।

ASI के सख्त नियमों का हवाला देकर प्रशासन इस मंदिर को साल के 364 दिन ताले में बंद रखता है। हिंदुओं को केवल महाशिवरात्रि के दिन (साल में सिर्फ 1 बार) वहां जाकर पूजा करने की अनुमति मिलती है। सनातन समाज का सीधा सवाल है कि जब एक ऐतिहासिक और संरक्षित इमारत की सुरक्षा के नाम पर मंदिर के लिए इतने कड़े नियम हैं, तो उसी किले में रमजान के दौरान पूरे 30 दिनों तक तोप दागने, बारूद के धमाके करने और नमाज पढ़ने की खुली छूट कैसे दी जा सकती है?

मानवाधिकार आयोग (NHRC) और कानून क्या कहता है?

यह मामला सिर्फ भावनाओं का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर कानून के उल्लंघन से भी जुड़ा है। हाल ही में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी इस मामले में सख्त ऐतराज जताया है। कानूनी जानकारों के मुताबिक:

• रायसेन का किला एक संरक्षित ऐतिहासिक धरोहर है। इसके पास किसी भी तरह का विस्फोट या बारूद का इस्तेमाल करना पूरी तरह गैरकानूनी है, क्योंकि इससे इमारत को नुकसान पहुंच सकता है।

• इतनी बड़ी तोप और बारूद का इस्तेमाल करने के लिए ‘पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन’ (PESO) और ‘केंद्रीय गृह मंत्रालय’ से अनुमति लेना अनिवार्य है, जो कि स्थानीय प्रशासन के पास नहीं है। कोई भी कलेक्टर अपने स्तर पर इसकी अनुमति नहीं दे सकता।

अब प्रशासन के फैसले पर सबकी नजर

सालों से जिला प्रशासन शांति व्यवस्था और परंपरा के नाम पर तोप चलाने की अनुमति देता आ रहा था। लेकिन अब जब मामला मानवाधिकार आयोग की नजर में है और आज पूरा हिंदू समाज इसके खिलाफ सड़क पर उतर रहा है, तो प्रशासन पर भारी दबाव है। अब पूरे शहर की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस शांतिपूर्ण लेकिन कड़े विरोध के बाद रायसेन कलेक्टर और प्रशासन क्या कानूनी कदम उठाते हैं।

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