अमरावती/नई दिल्ली:

कर्नाटक के बाद अब आंध्र प्रदेश सरकार ने बाल कल्याण और साइबर सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने घोषणा की है कि अगले 90 दिनों के भीतर 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सभी प्रकार के सोशल मीडिया मंचों (जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक, स्नैपचैट आदि) के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाएगा।

इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य बच्चों को डिजिटल लत, साइबर बुलिंग (ऑनलाइन उत्पीड़न) और अनुचित सामग्री से बचाना है। मनोवैज्ञानिकों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कदम का व्यापक स्वागत किया है। सरकार अब तकनिकी कंपनियों के साथ मिलकर आयु-सत्यापन (Age Verification) की कठोर प्रणाली विकसित करने पर काम कर रही है।

संपादकीय विश्लेषण: क्यों न यह प्रतिबंध पूरे देश में लागू हो?

आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की इस पहल ने एक बड़ी राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। जब समस्या राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की है, तो समाधान केवल कुछ राज्यों तक सीमित क्यों रहे? इस कानून को संपूर्ण भारत में लागू करने के पक्ष में निम्नलिखित मजबूत तर्क हैं:

1. मानसिक स्वास्थ्य का संरक्षण

विभिन्न शोध यह सिद्ध कर चुके हैं कि कम उम्र में सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों में अवसाद (डिप्रेशन), चिंता (एंग्जायटी) और हीन भावना को बढ़ाता है। ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ की आभासी दुनिया बच्चों के कच्चे मस्तिष्क पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। एक राष्ट्रीय प्रतिबंध बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बचाने में एक ढाल का काम करेगा।

2. साइबर अपराधों और बाल शोषण से बचाव

इंटरनेट पर बच्चों को निशाना बनाने वाले अपराधियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चे ऑनलाइन खतरों को समझने और उनसे बचने में अक्षम होते हैं। पूरे देश में इस नियम के लागू होने से बालकों के खिलाफ होने वाले साइबर अपराधों में भारी कमी आएगी।

3. शारीरिक और बौद्धिक विकास पर ध्यान

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की लत ने बच्चों को खेल के मैदानों और किताबों से दूर कर दिया है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रतिबंध लगता है, तो बच्चों का ध्यान बाहरी शारीरिक गतिविधियों, रचनात्मक कार्यों और वास्तविक सामाजिक संवाद की ओर वापस लौटेगा, जो उनके सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

4. इंटरनेट की कोई सीमा नहीं होती

इंटरनेट किसी राज्य की भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानता। यदि केवल आंध्र प्रदेश या कर्नाटक में प्रतिबंध लगता है, तो बच्चे वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) या अन्य राज्यों के सर्वर के माध्यम से आसानी से इन नियमों को तोड़ सकते हैं। इसलिए, एक प्रभावी नियंत्रण के लिए एक ‘केंद्रीय कानून’ (Central Law) का होना अनिवार्य है।

5. तकनीकी कंपनियों पर राष्ट्रीय दबाव

जब पूरे देश में एक समान कानून लागू होगा, तब बड़ी विदेशी तकनीकी कंपनियों (जैसे मेटा, गूगल) पर भारत के अनुसार अपनी नीतियां बदलने और आयु-सत्यापन के कड़े सुरक्षा उपाय लागू करने का दबाव पड़ेगा। अलग-अलग राज्यों के नियमों को तकनीकी कंपनियां अक्सर गंभीरता से नहीं लेती हैं।

बच्चों का भविष्य ही देश का भविष्य है। जिस प्रकार बच्चों के लिए मतदान या वाहन चलाने की एक न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित है, उसी प्रकार इस डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर प्रवेश की भी एक स्पष्ट राष्ट्रीय आयु सीमा होनी चाहिए। केंद्र सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए एक राष्ट्रव्यापी नीति लानी चाहिए।

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