स्कूल माफिया’ के दबाव में शिक्षा विभाग? सांदीपनि (CM Rise) स्कूलों में प्राइवेट बच्चों की ‘नो-एंट्री’

भोपाल|मध्य प्रदेश :

मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग के एक नए फैसले ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। शिक्षा विभाग ने हाल ही में हुई एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के बाद प्रदेश के सांदीपनि (सीएम राइज) विद्यालयों में प्राइवेट स्कूलों से आने वाले बच्चों के एडमिशन पर रोक लगा दी है।

आरोप लग रहे हैं कि यह फैसला सीधे तौर पर निजी स्कूल संचालकों के दबाव में लिया गया है। इस आदेश के कारण गरीब और मध्यम वर्गीय छात्रों, खासकर RTE (शिक्षा का अधिकार) के तहत पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है।

क्यों लिया गया एडमिशन रोकने का फैसला?

सरकार ने सांदीपनि (CM Rise) स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम, आधुनिक लैब और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी शानदार सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। इन सरकारी स्कूलों की बेहतरीन क्वालिटी देखकर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र भी बड़ी संख्या में सांदीपनि स्कूलों की तरफ रुख कर रहे थे।

लगातार बच्चे छोड़कर जाने से प्राइवेट स्कूलों की सीटें खाली होने लगी थीं। सूत्रों के मुताबिक, इसी बात से परेशान होकर ‘निजी स्कूल एसोसिएशन’ ने शिक्षा विभाग पर दबाव बनाया कि वे अपने सरकारी स्कूलों में प्राइवेट बच्चों को एडमिशन न दें। हैरान करने वाली बात यह है कि विभाग ने इस मांग को स्वीकार भी कर लिया है।

RTE के छात्रों पर सबसे बड़ा संकट

इस फैसले का सबसे बड़ा खामियाजा उन बच्चों को भुगतना पड़ रहा है, जो RTE के तहत प्राइवेट स्कूलों में कक्षा 8 तक मुफ्त पढ़ाई कर रहे थे।

• रीवा का मामला: रीवा जिले के डभौरा इलाके में करीब 13 ऐसे प्राइवेट स्कूल हैं, जो सिर्फ 8वीं कक्षा तक ही चलते हैं।

• इस पूरे क्षेत्र में हायर सेकेंडरी की पढ़ाई के लिए एकमात्र विकल्प सांदीपनि स्कूल ही है।

• अब 8वीं पास कर चुके करीब 135 छात्रों को सांदीपनि में 9वीं कक्षा में एडमिशन नहीं मिल रहा है। सत्र शुरू हो चुका है और ये छात्र परेशान घूम रहे हैं।

अधिकारियों और प्राचार्यों का क्या कहना है?

स्कूलों के प्राचार्यों का कहना है कि उन्हें वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा साफ निर्देश दिए गए हैं कि प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को प्रवेश न दिया जाए। नई एडमिशन पॉलिसी के तहत प्राथमिकता सिर्फ सरकारी स्कूलों से आने वाले बच्चों को ही दी जाएगी। अगर कुछ सीटें खाली बचती हैं, तो उसके लिए वरिष्ठ अधिकारियों को प्रस्ताव भेजकर अनुमति लेनी होगी।

एक्सपर्ट्स ने बताया छात्र-विरोधी फैसला

शिक्षा विभाग के पूर्व अधिकारियों और एजुकेशन एक्सपर्ट्स ने इस फैसले को ‘छात्रों के हितों के विपरीत’ बताया है। उनका कहना है कि अगर सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधरी है और बच्चे वहां पढ़ना चाहते हैं, तो उन्हें रोकना पूरी तरह गलत है। सरकारी स्कूलों के दरवाजे हर उस बच्चे के लिए खुले होने चाहिए जो बेहतर शिक्षा पाना चाहता है।

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