ग्यारसपुर/विदिशा: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों की सूरत बदलने के लिए चलाई जा रही योजनाएं धरातल पर किस कदर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं, इसका ताजा उदाहरण विदिशा जिले के ग्यारसपुर विकासखंड से सामने आया है। यहाँ ‘सांदीपनि विद्यालय योजना’ (शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय) के तहत लाखों-करोड़ों की लागत से तैयार किए गए नए स्कूल भवन की पोल महज 1 साल के भीतर ही खुल गई है। मानसून की पहली ही तेज बारिश ने भवन निर्माण की गुणवत्ता और जिम्मेदार अधिकारियों के दावों को पूरी तरह धोकर रख दिया है।

पहली ही बारिश में टपकने लगी छत, क्लासरूम बने तालाब

स्थानीय सूत्रों और पालकों से मिली जानकारी के अनुसार, इस नए भवन को बने और शिक्षा विभाग को हैंडओवर हुए अभी लगभग 1 साल का ही समय बीता है। लेकिन वर्तमान में स्थिति यह है कि हल्की सी बारिश होते ही स्कूल की छत से पानी का रिसाव (लीकेज) शुरू हो जाता है। क्लासरूम के अंदर पानी टपकने के कारण छात्रों को बैठने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। पानी के लगातार रिसाव से स्कूल का कीमती फर्नीचर, ब्लैकबोर्ड और जरूरी दस्तावेज़ भी खराब होने की कगार पर हैं।

घटिया निर्माण और तकनीकी लापरवाही आई सामने

इस मामले ने लोक निर्माण विभाग (PWD) और पीआईयू (PIU) के सब-इंजीनियर्स और ठेकेदारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारों का कहना है कि:

 कंक्रीट की ढलाई (Slab Casting) के समय सीमेंट और रेत के अनुपात में गड़बड़ी की गई।

 भवन की छत पर वाटरप्रूफिंग का काम या तो किया ही नहीं गया, या फिर बेहद घटिया दर्जे का केमिकल इस्तेमाल हुआ।

 कंक्रीट को पूरी तरह सेट होने से पहले ही शटरिंग हटा दी गई, जिससे छत में बारीक दरारें आ गईं।

बच्चों की सुरक्षा पर मंडराया बड़ा खतरा

लगातार पानी टपकने के कारण कंक्रीट के अंदर मौजूद लोहे की कड़ियां (सरिया) जंग पकड़ सकती हैं, जिससे भविष्य में छत का हिस्सा गिरने का डर बना हुआ है। विदिशा जिले में पहले भी कई जर्जर और घटिया निर्माण वाले स्कूलों में हादसे हो चुके हैं। इसके बावजूद प्रशासन इतने गंभीर मामले में मौन साधे बैठा है।

सजग नागरिकों ने की जांच की मांग

क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं और सजग नागरिकों ने इस मामले को लेकर आक्रोश जताया है। सोशल मीडिया पर भी स्कूल की बदहाली की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद अब जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) और विदिशा कलेक्टर से इस पूरे निर्माण कार्य की ‘तकनीकी ऑडिट’ (Technical Audit) कराने तथा दोषी ठेकेदार व इंजीनियरों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग की जा रही है।

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