कोलकाता । पश्चिम बंगाल:

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय देश भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। एक तरफ जहां जमीनी रिपोर्ट्स और जनता का एक बड़ा हिस्सा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) पर भरोसा जता रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) राज्य में अपनी सरकार बनाने का पक्का दावा कर रही है। लेकिन इन दोनों बड़ी पार्टियों की टक्कर के बीच असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) और पूर्व TMC नेता हुमायूं कबीर के नए गठबंधन ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

क्या कह रही है बंगाल की जनता और ग्राउंड रिपोर्ट?

जमीनी स्तर पर किए गए कई सर्वे और ग्राउंड रिपोर्ट्स की मानें, तो TMC अभी भी रेस में आगे दिख रही है। राज्य सरकार की कई योजनाओं का सीधा फायदा आम लोगों को मिला है, जिससे दीदी के समर्थकों की संख्या काफी मजबूत है। ग्रामीण इलाकों में TMC की पकड़ अब भी अच्छी मानी जा रही है और जनता का एक बड़ा वर्ग खुले तौर पर कह रहा है कि वे अपना वोट दीदी को ही देंगे।

BJP का पलटवार और सरकार बनाने का दावा

TMC की इस मजबूती के बावजूद BJP के हौसले बुलंद हैं। पार्टी के बड़े नेता लगातार राज्य का दौरा कर रहे हैं और यह दावा कर रहे हैं कि इस बार बंगाल में बदलाव तय है। BJP सत्ता विरोधी लहर और राज्य में कानून व्यवस्था के मुद्दों को जोर-शोर से उठा रही है। उनका मानना है कि इस बार बंगाल की जनता बदलाव के लिए वोट करेगी।

ओवैसी का गठबंधन: किसके साथ हुआ है ‘गठजोड़’?

इस पूरे चुनावी समीकरण में सबसे बड़ा ट्विस्ट असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (AIMIM) और हुमायूं कबीर की ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ (AJUP) की एंट्री है। हुमायूं कबीर पहले TMC के ही कद्दावर नेता और विधायक रह चुके हैं। हाल ही में TMC से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी नई पार्टी बनाई और अब ओवैसी के साथ मिलकर करीब 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।

दोनों नेताओं ने 1 अप्रैल से पूरे राज्य में 20 बड़ी रैलियां करने की घोषणा की है। मालदा, मुर्शिदाबाद और बीरभूम जैसे इलाकों में इस गठबंधन का सीधा असर देखने को मिल सकता है।

TMC के लिए सिरदर्द क्यों?

बंगाल में अल्पसंख्यक वोटरों की संख्या लगभग 27 प्रतिशत है, जो काफी समय से TMC का मजबूत वोट बैंक माने जाते हैं। ओवैसी और हुमायूं कबीर की नजर सीधे इसी वोट बैंक पर है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर यह नया गठबंधन अल्पसंख्यक वोटों में थोड़ी भी सेंध लगाता है, तो इसका सीधा नुकसान TMC को होगा। चुनाव में अगर 5 या 10 प्रतिशत वोट भी कटते हैं, तो कई सीटों के नतीजे पूरी तरह बदल सकते हैं। वोटों के इस बंटवारे का सीधा फायदा BJP को मिल सकता है। यही कारण है कि अपने ही पुराने नेता का ओवैसी के साथ जाना TMC के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गया है।

बंगाल का यह चुनाव एक बेहद रोमांचक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। क्या ममता बनर्जी अपने वोट बैंक को बचा पाएंगी?

क्या BJP अपने दावों को हकीकत में बदल पाएगी? या फिर ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन वास्तव में वह ‘खेला’ कर जाएगा, जिसका डर सबको सता रहा है? इसका असली जवाब तो 4 मई को चुनाव के नतीजे आने के बाद ही मिलेगा।

error: Content is protected !!