विशेष रिपोर्ट | नई दिल्ली/भोपाल :

कहते हैं शिक्षा इंसान को सही और गलत का फर्क सिखाती है, लेकिन आज के डिजिटल दौर में एक बेहद खौफनाक सच सामने आ रहा है। ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर और बड़े-बड़े डिग्रीधारी लोग भी सोशल मीडिया के Algorithm (एल्गोरिदम) और Trends की उंगली पकड़कर एक ऐसी भेड़चाल का हिस्सा बन चुके हैं, जहां उनका अपना विवेक पूरी तरह शून्य हो चुका है।

स्मार्टफोन की चंद इंच की स्क्रीन आज समाज के सबसे पढ़े-लिखे तबके के दिमाग को कंट्रोल कर रही है। यह महज मनोरंजन नहीं है, बल्कि एक गहरी ‘डिजिटल गुलामी’ है, जिसके प्रति अब सावधान होने का समय आ गया है।

क्या है यह ‘एल्गोरिदम का चक्रव्यूह’ और कैसे काम करता है?

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (Instagram, YouTube, Facebook, X) इंसानी कमज़ोरियों पर काम करते हैं। इनका एल्गोरिदम इस तरह तैयार किया गया है कि यह आपकी पसंद, नापसंद और आपकी कमज़ोरियों को रीड (Read) करता है।

1. इको चैंबर (Echo Chamber) का निर्माण: एल्गोरिदम आपको वही दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं। अगर आप किसी भ्रम या फेक न्यूज़ को पसंद करते हैं, तो आपकी स्क्रीन पर वैसी ही सैकड़ों वीडियोज़ आने लगेंगी। नतीजा यह होता है कि एक पढ़ा-लिखा इंसान भी उस झूठ को ही ब्रह्मांड का अंतिम सच मान बैठता है।

2. डोपामाइन का खेल (Dopamine Addiction): जब किसी पोस्ट पर लाइक्स और कमेंट्स आते हैं, तो दिमाग में डोपामाइन नाम का केमिकल रिलीज होता है, जो खुशी का अहसास कराता है। इसी ‘सस्ते आनंद’ की चाहत में समझदार लोग भी अजीबोगरीब और फूहड़ ट्रेंड्स पर नाचने या बिना सोचे-समझे विवादित बयान देने को मजबूर हो रहे हैं।

पढ़े-लिखे समाज की ३ सबसे बड़ी डिजिटल कमियां

 फैक्ट-चेक (Fact-Check) करने का आलस: आज समाज का सबसे पढ़ा-लिखा वर्ग भी व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर आई खबरों को बिना किसी प्रामाणिक सोर्स (Authentic Source) के सच मान लेता है। ‘फॉरवर्डेड मेनी टाइम्स’ लिखे मैसेज को धड़ल्ले से शेयर करना बुद्धिजीवियों की आदत बन चुका है।

 FOMO (पीछे छूट जाने का डर): “अगर मैंने इस ट्रेंडिंग टॉपिक पर रील नहीं बनाई या पोस्ट नहीं लिखी, तो लोग मुझे आउटडेटेड समझेंगे।” इसी डर के कारण लोग अपनी प्राइवेसी और मर्यादा को ताक पर रख रहे हैं।

 गंभीर चिंतन का अंत: रील्स और शॉर्ट्स के इस दौर में लोगों की ध्यान लगाने की क्षमता (Attention Span) घटकर सिर्फ १० से १५ सेकंड रह गई है। किताबों, गंभीर लेखों और खेती-किसानी, अर्थव्यवस्था या समाज सुधार जैसे जरूरी मुद्दों पर गहन चर्चा करने के बजाय लोग सतही और खोखले कंटेंट में डूबे हुए हैं।

एक्सपर्ट ओपिनियन: कैसे तोड़ें इस डिजिटल भेड़चाल को?

“डिग्री आपके हाथ में एक कागज का टुकड़ा मात्र है, अगर आपका दिमाग सोशल मीडिया के एल्गोरिदम के इशारे पर नाच रहा है।”

साइकोलॉजिस्ट और डिजिटल एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस मानसिक महामारी से बचने के लिए तुरंत ये कदम उठाने होंगे:

 ‘स्टॉप एंड थिंक’ (Rukie aur Sochiye) फॉर्मूला: स्क्रीन पर कुछ भी देखकर तुरंत रिएक्ट न करें। शेयर करने का बटन दबाने से पहले खुद से पूछें— क्या यह सच है? क्या इससे समाज का कोई भला होगा?

 डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox): हफ्ते में कम से कम १ दिन या दिन में कुछ घंटे सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाएं। नोटिफिकेशन को ऑफ रखें।

 एल्गोरिदम को धोखा दें: अपनी फीड को साफ रखने के लिए जानबूझकर ज्ञानवर्धक, खोजी और सकारात्मक कंटेंट को सर्च करें, ताकि एल्गोरिदम आपको कचरा परोसना बंद करे।

अब समय सिर्फ साक्षर होने का नहीं, बल्कि ‘डिजिटल रूप से जागरूक’ होने का है। अगर आज हम सोशल मीडिया के इस अदृश्य जाल से सावधान नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी सोचने और समझने की शक्ति पूरी तरह खो देगी। भेड़चाल का हिस्सा मत बनिए, अपनी सोच को स्वतंत्र रखिए।

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