नई दिल्ली: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पश्चिमी देशों का दोहरा रवैया एक बार फिर चर्चा में आ गया है। एक तरफ जहां अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत द्वारा रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने पर लगातार सवाल खड़े किए, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका खुद अपने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों (Nuclear Power Plants) को चलाने के लिए रूस से यूरेनियम का आयात करता रहा। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित केवल ताकतवर देशों के लिए हैं? अमेरिका की अपनी मजबूरी: रूसी यूरेनियम पर टिकी बिजली अमेरिका की कुल बिजली उत्पादन का लगभग 20% हिस्सा परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से आता है। इन संयंत्रों को चलाने के लिए जरूरी एनरिच्ड यूरेनियम का करीब 20% से 24% हिस्सा अमेरिका लंबे समय से रूस से खरीदता रहा है। युद्ध के दौरान यूक्रेन को अरबों डॉलर की सैन्य सहायता देने के बावजूद, अमेरिका ने रूसी यूरेनियम पर तुरंत कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। बाद में जब प्रतिबंध से जुड़ा कानून बना भी, तो उसमें वर्ष 2028 तक अस्थायी छूट (Waivers) का रास्ता खुला रखा गया, ताकि अमेरिका के घरेलू बिजली संयंत्र बंद न हों। भारत के कच्चे तेल पर आपत्ति क्यों? भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम नियंत्रित रखने तथा महंगाई से जनता को राहत देने के लिए भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदा। पश्चिमी देशों ने इस खरीद को यह रंग देने की कोशिश की कि भारत रूस के युद्ध को फंड कर रहा है, जबकि भारत ने साफ किया कि यह केवल अपने नागरिकों के हित में लिया गया एक आर्थिक फैसला है। भारत का दो-टूक जवाब: देशहित सर्वोपरि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक मंचों पर पश्चिमी देशों के इस दोहरे चरित्र को बेबाकी से उजागर किया: यूरोप युद्ध के बाद भी अपनी जरूरत के लिए रूस से भारी मात्रा में गैस और तेल खरीदता रहा। यदि भारत रूसी तेल छोड़कर पूरी तरह खाड़ी देशों की ओर मुड़ जाता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जातीं, जिससे पूरी दुनिया में महंगाई का बड़ा संकट खड़ा हो जाता। भारत की विदेश नीति किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि अपने 140 करोड़ नागरिकों की जरूरतों और राष्ट्रीय हितों से तय होती है। यह पूरा घटनाक्रम साफ करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पश्चिमी देश अपने आर्थिक और ऊर्जा हितों को ‘रणनीतिक आवश्यकता’ बताते हैं, लेकिन जब कोई विकासशील देश अपने नागरिकों के लिए वही रास्ता चुनता है, तो उस पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने की कोशिश की जाती है। भारत ने बिना किसी दबाव में आए यह साबित कर दिया है कि देशहित से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Post navigation US-Iran Peace Talks Fail: इस्लामाबाद में 21 घंटे चली शांति वार्ता क्यों हुई फेल? जानिए इनसाइड स्टोरी