नई दिल्ली:

दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति एलन मस्क का भारत में हाई-स्पीड सैटेलाइट इंटरनेट ‘स्टारलिंक’ (Starlink) शुरू करने का रास्ता अब लगभग साफ हो चुका है। भारतीय टेलीकॉम बाजार में एंट्री को लेकर मस्क की राह में कई रोड़े अटकाए गए, लेकिन नियमों और फैसलों की रफ्तार बता रही है कि अब मस्क की इस उड़ान को रोकना किसी के बस की बात नहीं है।

चर्चा इस बात की भी तेज हो गई है कि क्या 2026 खत्म होने से पहले ही देश में स्टारलिंक की आधिकारिक शुरुआत हो जाएगी?

क्यों एलन मस्क को रोकना हुआ नामुमकिन?

1. स्पेक्ट्रम नीलामी पर सरकार का फैसला:

स्टारलिंक की राह का सबसे बड़ा कांटा स्पेक्ट्रम आवंटन का तरीका था। घरेलू टेलीकॉम दिग्गज चाहते थे कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की भी नीलामी (Auction) हो, जिससे भारी पूंजी की जरूरत पड़ती। हालांकि, केंद्र सरकार ने नए टेलीकॉम एक्ट के तहत साफ कर दिया कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम नीलामी से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत प्रशासनिक आवंटन (Administrative Allocation) के जरिए ही दिया जाएगा। यह मस्क के रुख की बहुत बड़ी जीत साबित हुई।

2. विरोध के बावजूद रिलायंस का नरम रुख:

शुरुआती खींचतान और बयानों के बाद अब रिलायंस जियो ने भी रुख साफ करते हुए कहा है कि वह देश में स्टारलिंक सहित हर नए प्लेयर का स्वागत करती है और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से पीछे नहीं हटती। इससे साफ है कि बाजार के बड़े खिलाड़ी भी अब स्टारलिंक के मुकाबले के लिए तैयार हो रहे हैं।

3. सुरक्षा और डेटा शर्तों पर सहमति:

भारत सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी शर्तें—जैसे डेटा का भारत में ही स्टोर होना और लोकल गेटवे स्थापित करना—पर भी स्टारलिंक ने आवश्यक औपचारिकताएं तेजी से पूरी की हैं। डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्यूनिकेशंस (DoT) से जीएमपीसीएस (GMPCS) लाइसेंस की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।

क्या 2026 के अंत तक शुरू हो जाएगी सर्विस?

ट्राई (TRAI) स्पेक्ट्रम की प्राइसिंग और नियमों को अंतिम रूप देने में जुटी है। प्रशासनिक मंजूरियां मिलते ही स्टारलिंक को स्पेक्ट्रम अलॉट हो जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कागजी प्रक्रिया इसी रफ्तार से चली, तो 2026 के अंत तक स्टारलिंक अपनी आधिकारिक लॉन्चिंग या ट्रायल की घोषणा कर सकती है। हालांकि, ग्राउंड लेवल पर हार्डवेयर (डिश एंटीना) वितरण और फुल-फ्लेज्ड कमर्शियल सर्विस अगले साल की शुरुआत में रफ्तार पकड़ सकती है।

आम जनता को क्या मिलेगा फायदा?

स्टारलिंक जमीन पर लगे मोबाइल टावरों या फाइबर केबल पर निर्भर नहीं है। यह सीधे अंतरिक्ष में मौजूद लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स से सिग्नल भेजता है। इसका सबसे बड़ा फायदा:

 देश के सुदूर जंगलों, पहाड़ों, सीमावर्ती इलाकों और दूर-दराज के गांवों में भी 100 से 200 Mbps तक की तेज इंटरनेट स्पीड मिलेगी।

फाइबर कटने या टावर खराब होने का कोई झंझट नहीं रहेगा।

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