भोपाल/मध्य प्रदेश:

शारदीय नवरात्रि में माँ दुर्गा की उपासना और साधना का पर्व गरबा आज अपनी मूल पहचान खोता नजर आ रहा है। भोपाल के कई गरबा पंडालों से ऐसे दृश्य सामने आ रहे हैं, जहाँ भक्ति और श्रद्धा की जगह पश्चिमी चकाचौंध और बॉलीवुड के तड़क-भड़क वाले गानों ने ले ली है। इस बदलाव को लेकर शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और समाज के जागरूक लोगों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या मॉडर्न दिखने की होड़ में हमारी धार्मिक मर्यादाएँ और परंपराएँ पीछे छूटती जा रही हैं?

‘डांडिया नाइट्स’ और ‘डांडिया डेट्स’ के नाम पर भटकाव

चिंता का सबसे बड़ा विषय यह है कि सोशल मीडिया और युवा वर्ग के बीच इस पावन अनुष्ठान को ‘डांडिया नाइट्स’ और यहाँ तक कि ‘डांडिया डेट्स’ का नाम देकर प्रचारित किया जा रहा है। जिस मंच का उद्देश्य देवी की आराधना और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करना था, उसे युवक-युवतियों के लिए केवल मेल-जोल, मौज-मस्ती और डेटिंग का जरिया बना दिया गया है। पावन उत्सव को इस तरह की शब्दावली और मानसिकता से जोड़ना हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर पर सीधा प्रहार है।

देवी स्तुति की जगह बॉलीवुड के फिल्मी गाने

गरबा का मूल उद्देश्य माँ आद्यशक्ति की स्तुति, पारंपरिक आरती और भक्ति गीतों के जरिए दैवीय ऊर्जा से जुड़ना है। लेकिन पिछले कुछ सालों में बड़े आयोजनों के नाम पर भक्ति गीतों को किनारे कर दिया गया है। पंडालों में फूहड़ और अश्लील बोल वाले फिल्मी गानों पर लोग थिरकते दिखाई दे रहे हैं। जिस मंच पर माँ दुर्गा की अखंड ज्योति जल रही हो, वहाँ ऐसे द्विअर्थी गानों पर नृत्य किस हद तक उचित ठहराया जा सकता है?

फैशन की होड़ में मर्यादा तार-तार

गरबे की पहचान पारंपरिक गुजराती या मालवी पोशाक—जैसे चनिया-चोली और शालीन परिधानों से रही है, जो भारतीय संस्कृति की गरिमा को दर्शाते हैं। लेकिन आधुनिक और ग्लैमरस दिखने की अंधी दौड़ में पहनावे की मर्यादा को पूरी तरह भुलाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर रील्स बनाने और खुद को दूसरों से अलग दिखाने के चक्कर में कई जगह ऐसा माहौल बन चुका है जो किसी क्लब या डिस्को पार्टी से कम नहीं लगता।

धार्मिक आयोजनों का व्यवसायीकरण

जब आयोजन भक्ति का न रहकर कमर्शियल इवेंट बन जाता है, तो वहाँ संस्कृति की जगह सिर्फ मनोरंजन और मुनाफा बचता है। महंगे पास, वीआईपी कल्चर और डीजे के शोर-शराबे ने इस पावन उत्सव को एक तमाशा बनाकर रख दिया है। इसके लिए किसी बाहरी को दोष देने के बजाय खुद हिंदू समाज को आत्ममंथन करना होगा कि अपने ही पावन त्योहारों का यह स्वरूप हम कहाँ ले जा रहे हैं।

संस्कृति बचाने के लिए आत्ममंथन की जरूरत

धार्मिक परंपराएँ समाज के मूल्यों और अनुशासन की रीढ़ होती हैं। आधुनिक होना गलत नहीं है, लेकिन आधुनिकता के नाम पर अपनी ही मान्यताओं और देवी साधना का मखौल उड़ाना चिंताजनक है। यदि आयोजक मंडल और स्वयं समाज ने अपनी प्राथमिकताओं को तय नहीं किया, तो गरबा अपनी आध्यात्मिक आत्मा पूरी तरह खो देगा।

समय रहते यह समझना जरूरी है कि गरबा कोई मौज-मस्ती का डांस क्लब या डेटिंग पॉइंट नहीं, बल्कि माँ भगवती की आराधना का एक पवित्र अनुष्ठान है।

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