​नई दिल्ली:

देश के प्रमुख सरकारी बैंकों में शुमार ‘बैंक ऑफ़ बड़ौदा’ (Bank of Baroda) ने अबू धाबी और लंदन की अदालतों में चल रहे मुकदमों को रफा-दफा करने के लिए करीब ₹5,700 करोड़ (600 मिलियन डॉलर) का भारी-भरकम भुगतान करने का फैसला किया है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बहुचर्चित एनएमसी हेल्थ (NMC Health) घोटाले से जुड़े इस मामले में इतनी बड़ी रकम समझौते में जाने के बाद सवाल उठने लगे हैं, क्योंकि सरकारी बैंक होने के नाते इसमें करोड़ों आम नागरिकों और करदाताओं की गाढ़ी कमाई जुड़ी है।

​अरबों के घोटाले से जुड़ा है विवाद

​यह पूरा मामला UAE के सबसे बड़े निजी हेल्थकेयर समूह ‘NMC Health’ के दिवालिया होने से जुड़ा है। कंपनी पर बैंकों से लगभग $6.6 बिलियन (करीब 50,000 करोड़ रुपये से अधिक) का कर्ज छुपाने और वित्तीय धोखाधड़ी के आरोप लगे थे।

​कंपनी के दिवालिया होने के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रशासकों ने लंदन और अबू धाबी की अदालतों में बैंक ऑफ़ बड़ौदा पर केस दर्ज किया था। आरोप था कि बैंक की अबू धाबी शाखा ने संदिग्ध लेन-देन और नियमों की अनदेखी कर कंपनी के असली कर्ज को छुपाने में मदद की।

​केस खत्म करने के लिए दी विशाल रकम

​अबू धाबी कोर्ट में 15 हफ्तों की सुनवाई के बाद बैंक ने कानूनी जोखिम और अनिश्चितता से बचने के लिए कोर्ट के बाहर ₹5,700 करोड़ चुकाकर समझौता कर लिया। बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने स्पष्ट किया है कि यह भुगतान बिना किसी दोष को स्वीकार किए किया गया है और इसके साथ ही विदेश में चल रहे सभी केस पूरी तरह वापस ले लिए गए हैं।

​जनता की कमाई और बैंक की बैलेंस शीट पर असर

​बैंक ऑफ़ बड़ौदा में भारत सरकार की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। जानकारों का कहना है कि विदेशों में हुए विवाद को सुलझाने के लिए करीब ₹6,000 करोड़ की रकम बैंक के मुनाफे और प्रोविजनिंग से ही निकलेगी, जिसका सीधा असर बैंक की वित्तीय सेहत और अंततः सार्वजनिक पूंजी पर पड़ेगा।

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