भोपाल: मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार राज्य में एक बड़ा और ऐतिहासिक सामाजिक बदलाव करने जा रही है। प्रदेश में अब बिना शादी के ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (Live-in Relationship) में रहने वाले पुरुषों की मनमानी नहीं चलेगी। अगर कोई पुरुष अपनी लिव-इन पार्टनर को धोखा देता है या उसे बीच में ही छोड़ देता है, तो उसे महिला को भारी मुआवजा और मासिक गुजारा भत्ता (Maintenance) देना होगा।

सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस नियम को आगामी जुलाई के मानसून सत्र में विधानसभा में पेश होने वाले यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक के जरिए लागू करने की तैयारी में है। इसके लिए गठित की गई विशेष समिति ने ड्राफ्ट भी तैयार कर लिया है।

महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े प्रावधान

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के संकेतों के बाद तैयार हो रहे इस नए ड्राफ्ट में लिव-इन में रहने वाली महिलाओं और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिए कई कड़े नियम शामिल किए जा रहे हैं:

 पार्टनर ने छोड़ा तो देना होगा गुजारा भत्ता: यदि कोई जोड़ा लंबे समय तक साथ रहता है और फिर पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो महिला अदालत के जरिए मुआवजे और गुजारे भत्ते की हकदार होगी।

 बच्चों को मिलेगा पैतृक संपत्ति में हक: इस नए कानून के तहत लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चों को पूरी तरह से वैध (Legitimate) माना जाएगा। उन्हें अपने पिता की पैतृक संपत्ति में कानूनी तौर पर पूरा अधिकार मिलेगा।

 घरेलू हिंसा कानून के तहत मिलेगी सुरक्षा: शादीशुदा महिलाओं की तरह ही लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को भी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून (DV Act) के तहत पूरी सुरक्षा मिलेगी।

नेताओं के बयानों और सरकारी कानून में बड़ा विरोधाभास!

इस पूरे मामले में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि राजनीतिक मंचों और जमीन पर सरकारों का रवैया बिल्कुल अलग नजर आता है।

एक तरफ जहां देश के कई बड़े नेता, मंत्री और राजनेता सार्वजनिक मंचों से लिव-इन रिलेशनशिप को “भारतीय संस्कारों के खिलाफ”, “पश्चिमी संस्कृति का कुप्रभाव” और “सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने वाला” बताते रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, सरकारों को कानूनन इसे मान्यता और सुरक्षा देनी पड़ रही है।

इस विरोधाभास के पीछे की बड़ी वजह देश का संविधान और सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि दो बालिगों का आपसी सहमति से साथ रहना उनका मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) है और यह कोई अपराध नहीं है। ऐसे में सरकारें चाहकर भी इस पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगा सकतीं। यही वजह है कि राजनेता सामाजिक रूप से भले ही इसका विरोध करते दिखें, लेकिन प्रशासनिक और कानूनी मजबूरी के कारण उन्हें महिलाओं की सुरक्षा के लिए ऐसे नियम बनाने पड़ रहे हैं। सरकार का मकसद इसका समर्थन करना नहीं, बल्कि इसके कारण होने वाले अपराधों पर लगाम कसना है।

उत्तराखंड की तर्ज पर रजिस्ट्रेशन भी हो सकता है अनिवार्य

माना जा रहा है कि उत्तराखंड की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) अनिवार्य किया जा सकता है। इसके तहत अगर कोई बालिग जोड़ा लिव-इन में रहना चाहता है, तो उसे इसकी जानकारी जिला प्रशासन को देनी होगी। इससे लिव-इन के नाम पर होने वाले अपराधों, हत्याओं और धोखेबाजी पर लगाम कसी जा सकेगी और सरकारों के पास इसका पूरा रिकॉर्ड रहेगा।

जनता से भी मांगी जा रही है राय

इस ऐतिहासिक कानून को पूरी तरह पारदर्शी और व्यावहारिक बनाने के लिए सरकार जनता से भी सुझाव ले रही है। इसके तहत ऑनलाइन माध्यम से आम लोगों से 12 महत्वपूर्ण सवाल पूछे जा रहे हैं, जिन पर ‘हाँ’ या ‘ना’ में जवाब मांगे जा रहे हैं। जनता का समर्थन मिलने के बाद इस बिल को कैबिनेट की मंजूरी के साथ विधानसभा के पटल पर रखा जाएगा।

error: Content is protected !!