भोपाल / मध्य प्रदेश:

मध्य प्रदेश की राजनीति में इस समय भूचाल आया हुआ है। राज्य की 3 राज्यसभा सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवारों (तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट) के निर्विरोध चुने जाने के बाद, अब यह मामला राजनीतिक गलियारों से निकलकर कानूनी लड़ाई में बदल चुका है। कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद से ही देश भर में चुनाव आयोग और रिटर्निंग ऑफिसर (RO) की भूमिका पर तीखे सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर बड़ा हमला बता रहा है। आइए समझते हैं कि इस पूरे विवाद की मुख्य वजह क्या है और चुनाव आयोग के फैसलों पर उंगलियां क्यों उठ रही हैं।

क्या है पूरा विवाद? (क्यों रद्द हुआ नामांकन)

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब स्क्रूटनी (नामांकन पत्रों की जांच) के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का फॉर्म निरस्त कर दिया।

 आरोप: बीजेपी उम्मीदवार महेश केवट ने आपत्ति दर्ज कराई थी कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने शपथ पत्र (Form 26) में तेलंगाना की एक कोर्ट में लंबित शिकायत (Complaint Case) की जानकारी छिपाई है।

 कांग्रेस का पक्ष: कांग्रेस का साफ कहना है कि नटराजन के खिलाफ उस मामले में न तो कोई FIR दर्ज है और न ही कोर्ट ने आरोप (Charges) तय किए हैं। नियमों के मुताबिक, जब तक आरोप तय न हों, तब तक उसे हलफनामे में लिखना अनिवार्य नहीं होता। कांग्रेस ने इसे पूरी तरह से ‘साजिश’ करार दिया है।

चुनाव आयोग की भूमिका पर क्यों खड़े हो रहे हैं 3 बड़े सवाल?

कांग्रेस और राजनीतिक विश्लेषकों ने इस पूरे घटनाक्रम में चुनाव आयोग और स्थानीय चुनावी अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर निम्नलिखित सवाल उठाए हैं:

1. प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का उल्लंघन क्यों?

नियमों के मुताबिक, अगर किसी उम्मीदवार के फॉर्म में कोई तकनीकी कमी पाई जाती है, तो उसे सुधारने या अपना पक्ष रखने का उचित समय दिया जाता है। विपक्ष का आरोप है कि रिटर्निंग ऑफिसर ने कांग्रेस प्रत्याशी को अपना रुख स्पष्ट करने का मौका दिए बिना, बेहद जल्दबाजी में फैसला सुना दिया।

2. ‘सीटों की चोरी’ का गंभीर आरोप

कांग्रेस के दिग्गज नेताओं दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी ने सीधे तौर पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता को कठघरे में खड़ा किया है। नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग ने इस मामले में शिकायत मिलने के बाद भी कोई ठोस दखल नहीं दिया, जिससे बीजेपी को एकतरफा फायदा हुआ। उन्होंने इसे लोकतंत्र में “सीटों की चोरी” (Seat Theft) बताया है।

3. परिणाम घोषित करने में इतनी जल्दबाजी क्यों?

इन सीटों पर मतदान 18 जून को होना तय था। लेकिन कांग्रेस का फॉर्म रद्द होते ही, चुनाव आयोग के अधिकारियों ने नाम वापसी के तुरंत बाद बीजेपी उम्मीदवारों को जीत का सर्टिफिकेट सौंप दिया। विपक्ष का आरोप है कि यह जल्दबाजी इसलिए की गई ताकि मामला कोर्ट में जाने से पहले ही चुनावी प्रक्रिया को खत्म दिखाया जा सके।

अब आगे क्या? सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के दरवाजे पर कांग्रेस

इस एकतरफा फैसले के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस ने हार नहीं मानी है और मामले को देश के सबसे बड़े मंचों पर ले गई है:

 सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: कांग्रेस ने रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। हालांकि कोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया के बीच में रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन अब परिणाम घोषित होने के बाद कोर्ट इस मामले की वैधानिकता पर सुनवाई करेगा।

 राष्ट्रपति से गुहार: एमपी कांग्रेस के विधायकों का एक दल इस मामले को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने का समय मांग रहा है, ताकि केंद्रीय स्तर पर इस चुनावी प्रक्रिया की जांच की मांग की जा सके।

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