नई दिल्ली । विशेष रिपोर्ट:

भारत की राजनीति और बिजनेस जगत में ‘अडानी ग्रुप’ और सरकारी संस्था ‘FCI’ (Food Corporation of India) के बीच की पार्टनरशिप हमेशा सुर्खियों में रहती है। विपक्ष लगातार आरोप लगाता है कि सरकार ने इस डील के जरिए अडानी ग्रुप को मोटा मुनाफा कमा कर दिया है।

आखिर यह पूरा मामला क्या है? सरकार ने अडानी ग्रुप को क्या फायदे दिए हैं? और विपक्ष इस पर इतना गुस्सा क्यों है? आइए इसे बिल्कुल आसान शब्दों में समझते हैं।

1. क्या है अडानी और FCI का यह पूरा प्रोजेक्ट?

यह पूरा मामला देश के अनाज को सुरक्षित रखने (Grain Storage) से जुड़ा है। पारंपरिक रूप से भारत में अनाज को जूट की बोरियों में भरकर सामान्य गोदामों में रखा जाता है, जिससे अनाज के सड़ने या चूहे खा जाने का खतरा रहता है।

इस बर्बादी को रोकने के लिए सरकार ने आधुनिक टेक्नोलॉजी वाले ‘स्टील साइलो’ (Steel Silos) बनाने का फैसला किया। ये स्टील के बड़े-बड़े ऊंचे कंटेनर होते हैं, जिनमें अनाज सालों तक खराब नहीं होता।

 इसके लिए FCI ने PPP (Public-Private Partnership) मॉडल के तहत टेंडर निकाले।

 अडानी ग्रुप की कंपनी ‘Adani Agri Logistics’ ने इस रेस में हिस्सा लिया और देश भर में कई बड़े कॉन्ट्रैक्ट हासिल किए।

 काम का तरीका: अडानी ग्रुप इन साइलो को बनाता है और वहां तक रेलवे ट्रैक बिछाता है। FCI किसानों से अनाज खरीदकर इन साइलो में रखती है और इसके बदले अडानी ग्रुप को भारी-भरकम स्टोरेज चार्ज (किराया) देती है।

2. यह मामला कब शुरू हुआ और विवाद कब बढ़ा?

 शुरुआत (2005-2007): बहुत से लोग सोचते हैं कि यह अभी का मामला है, लेकिन इसकी शुरुआत UPA-1 सरकार के समय 2005 में हुई थी। 2007 में अडानी ग्रुप ने पंजाब और हरियाणा में देश के पहले आधुनिक साइलो बनाए थे।

 तेजी (2016 से अब तक): मोदी सरकार आने के बाद देश में अनाज भंडारण के आधुनिकीकरण में तेजी आई और FCI ने बड़े पैमाने पर नए टेंडर जारी किए।

 विवाद की वजह (2020-2021): जब देश में तीन नए कृषि कानून आए और किसान आंदोलन शुरू हुआ, तब विपक्ष ने इस डील को लेकर सरकार को घेरना शुरू किया।

3. सरकार ने अडानी ग्रुप को क्या ‘खास’ प्रॉफिट कराया? (विपक्ष के आरोप)

विपक्ष का आरोप है कि सरकार की नीतियों और टेंडर की शर्तों के कारण अडानी ग्रुप के लिए यह बिजनेस ‘बिना किसी रिस्क के अंधा मुनाफा’ कमाने का जरिया बन गया है। इसके पीछे 3 मुख्य कारण बताए जाते हैं:

क) ‘टेक-ऑर-पे’ (Take-or-Pay) मॉडल: कमाई की 100% गारंटी

FCI और अडानी के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट में सबसे बड़ा फायदा “Take-or-Pay” नियम का है। इसका मतलब यह है कि अगर अडानी ने 50 हजार टन का साइलो बनाया है, और किसी साल सूखा पड़ने या किसी अन्य वजह से वो साइलो खाली भी पड़ा रहे, तब भी FCI को पूरे 50 हजार टन का किराया अडानी ग्रुप को देना ही पड़ेगा। यानी कंपनी का बिजनेस रिस्क बिल्कुल जीरो है।

ख) 30 साल का लंबा कॉन्ट्रैक्ट

यह पार्टनरशिप 20 से 30 सालों के लंबे समय के लिए की गई है। विपक्ष का कहना है कि एक बार टेंडर मिलने के बाद अडानी ग्रुप के लिए अगले 30 सालों तक सरकारी खजाने से फिक्स कमाई का रास्ता साफ कर दिया गया।

ग) एकाधिकार (Monopoly) का आरोप

विपक्ष का दावा है कि नियमों और शर्तों को इस तरह से कठिन बनाया गया कि छोटे व्यापारी रेस से बाहर हो गए। देश के लगभग 134 बड़े साइलो प्रोजेक्ट्स में से करीब 110 कॉन्ट्रैक्ट अकेले अडानी ग्रुप को मिल गए। इसके साथ ही उन्हें अनाज ट्रांसपोर्ट करने के लिए अपनी खुद की प्राइवेट ट्रेनें (Bulk Grain Trains) चलाने की अनुमति भी मिली।

4. विपक्ष में गुस्सा क्यों है?

विपक्ष और किसान संगठनों के गुस्से के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी चिंताएं हैं:

1 क्रोनी कैपिटलिज्म (Crony Capitalism): विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार आम जनता के टैक्स का पैसा और सरकारी संसाधन चुनिंदा बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए लुटा रही है।

2 खाद्य सुरक्षा (Food Security) पर खतरा: विपक्ष का मानना है कि अगर देश के अनाज को स्टोर करने और उसे एक जगह से दूसरी जगह भेजने का पूरा कंट्रोल किसी एक प्राइवेट कंपनी के हाथ में आ गया, तो आगे चलकर वे अनाज की कीमतों और मंडियों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे देश में महंगाई या राशन संकट पैदा हो सकता है।

सरकार और अडानी ग्रुप का क्या पक्ष है?

दूसरी तरफ, सरकार और अडानी ग्रुप का कहना है कि भारत में हर साल रख-रखाव की कमी के कारण करोड़ों रुपये का अनाज सड़ जाता है। इस राष्ट्रीय बर्बादी को रोकने के लिए भारी निवेश और आधुनिक टेक्नोलॉजी की जरूरत थी, जो प्राइवेट सेक्टर ही कर सकता था। सरकार के मुताबिक, सभी टेंडर पूरी तरह से पारदर्शी और ओपन बिडिंग (Transparent Bidding) के जरिए दिए गए हैं, जिसमें कोई पक्षपात नहीं हुआ है।

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