भोपाल ।मध्य प्रदेश:

प्रदेश के अन्नदाता के लिए साल 2026 की यह बसंत खुशहाली के बजाय बर्बादी का मंजर लेकर आई है। आसमान से गिरे ओले सिर्फ बर्फ के टुकड़े नहीं थे, बल्कि वे किसानों के उन अरमानों पर गिरे हैं जिन्हें उन्होंने पिछले 4 महीनों से खून-पसीने से सींचा था। मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रशासन सर्वे में जुट गया है और मुआवजे की फाइलें तैयार हो रही हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सरकारी ‘मरहम’ किसान के गहरे ‘जख्म’ को भरने के लिए काफी है?

मुआवजा बनाम हकीकत: आंकड़ों की जुबानी किसान का दर्द

अगर हम सरकारी आंकड़ों और बाजार भाव की तुलना करें, तो किसान की स्थिति अत्यंत दयनीय नजर आती है। एक हेक्टेयर खेत का हिसाब देखें तो:

1. पूंजी की बर्बादी: आज की तारीख में एक हेक्टेयर में गेहूं की शानदार फसल की बाजार कीमत करीब 84,000 रुपये है। सरसों और चना की फसल का मूल्य भी 70,000 से 85,000 रुपये के बीच बैठता है।

2. सरकारी राहत की सीमा: सरकार की ओर से मिलने वाली अधिकतम सहायता राशि 16,000 रुपये प्रति हेक्टेयर तय की गई है।

3. 4 गुना बड़ा घाटा: यानी जिस किसान ने अपनी आंखों के सामने 84,000 रुपये की संपत्ति (फसल) खोई है, उसे सरकार केवल उसका 19% हिस्सा ही मुआवजे के रूप में दे पा रही है। बाकी का 80% से ज्यादा का नुकसान किसान को खुद अपनी जेब से भुगतना होगा।

लागत भी नहीं निकाल पाएगा अन्नदाता

आज के दौर में खेती अब सस्ती नहीं रही। खाद, बीज, कीटनाशक, जुताई, सिंचाई और लेबर का खर्च जोड़ लिया जाए, तो एक हेक्टेयर की लागत ही करीब 25,000 से 30,000 रुपये तक पहुंच जाती है।

• सरकार का 16,000 रुपये का मुआवजा तो किसान की लागत का आधा हिस्सा भी कवर नहीं कर पा रहा है।

• मुनाफा तो दूर की बात है, किसान को अब अपने घर के खर्च और अगली फसल के लिए बीज खरीदने तक के लाले पड़ सकते हैं।

कर्ज के जाल में फंसता परिवार

MP के अधिकांश किसान बैंकों या स्थानीय साहूकारों से कर्ज लेकर खेती करते हैं। फसल कटने के बाद उन्हें यह कर्ज चुकाना था। लेकिन अब जब फसल ही नहीं बची, तो कर्ज का ब्याज पहाड़ की तरह बढ़ने वाला है। किसानों का कहना है कि प्रशासन केवल खराब हुई फसल का मुआवजा दे रहा है, लेकिन उस ‘मानसिक तनाव’ और ‘आर्थिक गड्ढे’ का क्या जो इस तबाही ने पैदा किया है?

प्रशासनिक सर्वे पर उठते सवाल

जमीनी हकीकत यह भी है कि कई बार पटवारी और राजस्व विभाग का सर्वे कागजों तक सीमित रह जाता है। 20% या 30% नुकसान दिखाकर मुआवजे की राशि को और भी कम कर दिया जाता है। ऐसे में किसान की मांग है कि नुकसान का आकलन ‘उदारता’ के साथ किया जाए और मुआवजे की इस राशि को बाजार भाव के थोड़ा करीब लाया जाए।

बड़ा सवाल-

क्या सरकार को प्राकृतिक आपदा के समय पुरानी मुआवजा दरों (RBC 6-4) में बड़ा बदलाव नहीं करना चाहिए? क्या 16,000 रुपये में एक किसान परिवार अपनी पूरी साल की रोजी-रोटी चला पाएगा?

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