भोपाल | 13 मार्च, 2026

वेयरहाउस मालिकों की मनमानी और किसानों की जल्दबाजी पर लगा ब्रेक सोसाइटी और सरकारी कर्मचारियों की माँग पर मुख्यमंत्री और खाद्य सुरक्षा मंत्री गोविन्द सिंह राजपूत का बड़ा एक्शन !

मध्य प्रदेश में इस बार गेहूं की सरकारी खरीदी (उपार्जन) की तारीखों में बदलाव सिर्फ एक सामान्य आदेश नहीं है। यह ग्राउंड जीरो पर काम करने वाले उन हजारों छोटे कर्मचारियों और समिति प्रबंधकों की बहुत बड़ी जीत है, जो हर साल सिस्टम, वेयरहाउस मालिकों और किसानों के भारी मानसिक दबाव के बीच पिसते रहे हैं।

सरकार ने साफ कर दिया है कि इस बार गेहूं खरीदी 1 अप्रैल (इंदौर, उज्जैन, भोपाल, नर्मदापुरम) और 7 अप्रैल (बाकी संभागों) से शुरू होगी। इस फैसले ने उन लोगों की बोलती बंद कर दी है जो अपना स्वार्थ साधने के लिए छोटे कर्मचारियों पर नियम तोड़ने का दबाव बनाते थे।

आखिर क्या है वह ‘मानसिक दबाव’ का खेल?

गेहूं खरीदी के समय सबसे ज्यादा प्रताड़ना खरीदी केंद्रों (समितियों) पर बैठे छोटे कर्मचारियों को सहनी पड़ती है। उनके ऊपर दो तरफ से भारी दबाव होता है:

• किसानों की जल्दबाजी: प्रदेश के कई किसान गेहूं काटने के तुरंत बाद तीसरी फसल (मूंग) बोना चाहते हैं। खेत जल्दी खाली करने के लिए वे गेहूं के सिर्फ 95% पकने पर ही उसकी कटाई कर लेते हैं। इस ‘कच्चे गेहूं’ में नमी (Moisture) बहुत ज्यादा होती है। किसान दबाव बनाते हैं कि उनका गेहूं जल्दी तौल लिया जाए।

• वेयरहाउस मालिकों का स्वार्थ: दूसरी तरफ, वेयरहाउस (गोदाम) मालिक चाहते हैं कि उनका गोदाम सबसे पहले भर जाए ताकि उनका किराया पक्का हो सके। वे भी जल्दबाजी में नियमों की अनदेखी कर गेहूं भरवाने का दबाव बनाते हैं।

केमिकल वाला गेहूं’ और गरीबों की सेहत से खिलवाड़

जब नमी वाला कच्चा माल वेयरहाउस के अंदर बंद करके रखा जाता है, तो उसे कीड़ों और फंगस से बचाने के लिए बहुत अधिक मात्रा में केमिकल (दवाइयों) का छिड़काव करना पड़ता है।

• इन खतरनाक दवाइयों का असर (Residue) अनाज के अंदर तक चला जाता है।

• जब यही गेहूं राशन की दुकानों से गरीबों की थाली तक पहुंचता है, तो आम लोगों की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है और बीमारियां फैलती हैं।

हमेशा छोटे कर्मचारी ही बनते थे ‘बलि का बकरा’

जब किसानों और वेयरहाउस मालिकों के दबाव में आकर कर्मचारी ज्यादा नमी वाला कच्चा गेहूं तौल लेते थे, तो वह गोदामों में जाकर काला पड़ जाता था और खराब होने लगता था। बाद में जब ऊपर से जांच होती थी, तो गाज उसी छोटे कर्मचारी पर गिरती थी। किसान और वेयरहाउस मालिक तब अपना पल्ला झाड़ लेते थे। यह डर और दबाव कर्मचारियों के लिए एक भयानक मानसिक प्रताड़ना (Mental Harassment) बन चुका था।

ऐसे मिली छोटे अधिकारियों को जीत

कर्मचारियों की इसी परेशानी को देखते हुए इस बार खरीदी जल्दबाजी में शुरू नहीं की जा रही है। 1 और 7 अप्रैल का फैसला छोटे कर्मचारियों की जीत इसलिए है क्योंकि:

1. फसल पूरी तरह सूखेगी: अप्रैल की तेज धूप में गेहूं खेत में ही 100% पक कर सूख जाएगा और उसमें नमी खत्म हो जाएगी।

2. दबाव से मुक्ति: कर्मचारियों पर अब कच्चा गेहूं पास करने का कोई मानसिक दबाव नहीं रहेगा।

3. ईमानदारी से काम: अब वे बिना किसी डर के, मशीनों से नमी चेक करके ही सही गेहूं खरीद सकेंगे।

इस फैसले ने साबित कर दिया है कि सरकार अब ग्राउंड पर काम करने वाले छोटे कर्मचारियों को ‘बलि का बकरा’ नहीं बनने देगी और नियमों से कोई समझौता नहीं होगा।

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