इंदौर | विशेष संवाददाता

जब कोई शहर लगातार सात बार ‘देश का सबसे स्वच्छ शहर’ होने का जश्न मनाता है, तो उस चकाचौंध के पीछे का अंधेरा अक्सर छिप जाता है। सोमवार, 2 मार्च को इंदौर के चोइथराम मंडी गेट के पास एक ऐसा ही अंधेरा सीवर के एक मैनहोल से बाहर निकला और दो परिवारों की खुशियां निगल गया। नगर निगम के दो सफाई कर्मचारियों— करण यादव और अजय डोडी— की सीवर में जहरीली गैस (Toxic Gas) से दम घुटने से मौत हो गई।

यह कोई प्राकृतिक आपदा या अचानक हुआ हादसा नहीं था; यह उस ‘सिस्टम’ द्वारा की गई संस्थागत हत्या है, जिसके लिए आज भी एक गरीब और मजदूर की जान की कोई कीमत नहीं है।

हादसे की असल वजह: एक मामूली पाइप और दो अनमोल जिंदगियां

घटना की तह में जाएं तो यह जानकर रूह कांप जाती है कि आखिर ये मौतें हुईं कैसे। जानकारी के मुताबिक, सक्शन टैंकर से पानी खाली करते वक्त मशीन के पाइप का एक हिस्सा टूटकर गहरे सीवर चैंबर में गिर गया था।

महज उस एक मामूली पाइप को निकालने के लिए करण यादव को उस मौत के कुएं में उतार दिया गया। जब करण जहरीली गैस से बेहोश होने लगा और तड़पने लगा, तो उसे बचाने के लिए उसका साथी अजय डोडी भी अंदर कूद गया। बिना किसी सुरक्षा के, दोनों उसी जहरीली गैस का शिकार हो गए और मौके पर ही उन्होंने दम तोड़ दिया।

सवाल यह है कि क्या वह लोहे या प्लास्टिक का पाइप उन दो इंसानों की सांसों से ज्यादा कीमती था?

सिस्टम को कटघरे में खड़े करते 3 चुभते सवाल:

• सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुलेआम धज्जियां: सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट रूप से ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ (इंसानों द्वारा सीवर की सफाई) पर रोक लगा चुका है। सख्त नियम हैं कि बिना ऑक्सीजन सिलेंडर, सेफ्टी बेल्ट और गैस डिटेक्टर के किसी भी इंसान को सीवर में नहीं उतारा जाएगा। फिर इन दोनों को बिना सेफ्टी गियर के अंदर जाने का आदेश किसने दिया?

• जिम्मेदारों की गैरमौजूदगी: जब भी सीवर से जुड़ा ऐसा कोई जोखिम भरा काम होता है, तो वहां सुपरवाइजर या इंजीनियर का होना अनिवार्य है। लेकिन मौके पर ठेकेदार और निगम के अधिकारी नदारद थे। क्या गरीब को मरने के लिए छोड़ देना ही स्मार्ट सिटी का नया नियम है?

• एम्बुलेंस और रेस्क्यू में देरी: प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब यह घटना घटी तो मौके पर न कोई इमरजेंसी सुविधा थी और एम्बुलेंस को भी आने में काफी समय लगा। अंततः SDRF की टीम को शव निकालने के लिए आना पड़ा।

30 लाख का ‘सरकारी मरहम’ और असल सच्चाई

घटना के बाद जो हमेशा होता है, वही हुआ। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने दुख जताया और नियमों के तहत दोनों मृतकों के परिवारों को 30-30 लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा कर दी।

लेकिन यहीं पर व्यवस्था का सबसे घिनौना चेहरा सामने आता है। चंद हजार रुपयों के सेफ्टी गियर (ऑक्सीजन मास्क, सूट, गैस सेंसर) खरीदने में जिस सिस्टम को बजट की कमी याद आती है, वही सिस्टम मौत होने के बाद रातों-रात 60 लाख रुपये का चेक काट देता है। क्या यह मुआवजा है, या अपनी आपराधिक लापरवाही और नाकामी को छिपाने की कीमत?

कब थमेगा यह सिलसिला?

जब तक सफाई कर्मचारियों को अछूत या ‘निचले दर्जे’ का मजदूर मानकर उनके साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया जाता रहेगा, तब तक स्वच्छ भारत के तमाम दावे खोखले ही रहेंगे। करण और अजय सिर्फ जहरीली गैस से नहीं मरे हैं, वे उस संवेदनहीन व्यवस्था के शिकार हुए हैं जिसे यकीन है कि एक गरीब अगर मर भी गया, तो कुछ लाख रुपये देकर उसकी फाइल हमेशा के लिए बंद की जा सकती है।

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