भोपाल/ मध्य प्रदेश :

मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में सरकारी स्कूलों के मेंटेनेंस के नाम पर 149 करोड़ रुपए के बड़े घोटाले का मामला सामने आया है। इस मामले में सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि विभागीय मंत्री उदय प्रताप सिंह के सख्त आदेश के 7 दिन बाद भी अफसरों ने कोई कार्रवाई नहीं की है। न तो अब तक कोई जांच कमेटी बनी है और न ही जिम्मेदार अफसरों को उनके पद से हटाया गया है।

क्या है पूरा मामला?

केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने के लिए 149 करोड़ रुपए की राशि दी थी। इस राशि के टेंडर और भुगतान में भारी भ्रष्टाचार किया गया।

• घोटाले की परतें तब खुलीं जब मैहर के जिला शिक्षा अधिकारी ने विभाग को बताया कि उनके यहां स्कूलों में कोई काम स्वीकृत ही नहीं हुआ था, फिर भी काम के बिल जारी कर दिए गए।

• 8 जनवरी 2026 को आई एक जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि भोपाल की ‘वाणी इंफ्रास्ट्रक्चर फर्म’ को बिना कोई काम किए ही 23.81 लाख रुपए का पेमेंट कर दिया गया।

• यह मुद्दा कांग्रेस ने 26 फरवरी को विधानसभा में भी जोर-शोर से उठाया था।

मंत्री के आदेश को अफसरों ने किया अनसुना

मामला तूल पकड़ने के बाद मंत्री उदय प्रताप सिंह ने पिछले मंगलवार को 4 खास बिंदुओं पर एक नोटशीट लिखकर स्कूल शिक्षा सचिव डॉ. संजय गोयल को भेजी थी। इसमें मुख्य रूप से 3 निर्देश थे:

1. लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के दो अफसरों – डायरेक्टर डीएस कुशवाह और उप संचालक पीके सिंह को वहां से हटाकर दूसरी जगह अटैच किया जाए।

2. प्रदेश के सभी 55 जिलों के कलेक्टरों को पत्र लिखकर पिछले 3 साल में हुए मेंटेनेंस के कामों की जांच कराई जाए।

3. माध्यमिक शिक्षा मंडल के सचिव बुद्धेश वैद्य की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी बनाई जाए।

हालांकि, 7 दिन बीत जाने के बाद भी न तो कोई कमेटी बनी है और दागी अफसर अब भी अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं। इस पूरे रवैये से मंत्री काफी नाराज बताए जा रहे हैं।

अफसरों की भूमिका पर उठ रहे हैं सवाल

डीएस कुशवाह (डायरेक्टर): भवन से जुड़े सभी कामों की स्वीकृति इन्हीं के द्वारा दी गई।

पीके सिंह (उप संचालक): भवन का प्रभार इन्हीं के पास है।

राजेश मौर्य (वित्त अधिकारी): टेंडर जारी करने से लेकर रुपयों के भुगतान (पेमेंट) का सारा काम इन्हीं की निगरानी में हुआ है।

error: Content is protected !!