13 फरवरी 2026

नई दिल्ली/ढाका:

लंबे राजनीतिक वनवास और उथल-पुथल के बाद, बांग्लादेश की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो गया है। 12 फरवरी 2026 को हुए आम चुनावों के नतीजों ने साफ कर दिया है कि बांग्लादेश की जनता ने अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और तारीक रहमान के हाथ में देश की कमान सौंप दी है। 2024 में शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद से वहां चल रही अंतरिम सरकार का दौर अब खत्म हो रहा है।

लेकिन, ढाका में हुए इस सत्ता परिवर्तन की गूंज नई दिल्ली में भी साफ सुनी जा रही है। आइए समझते हैं कि BNP की यह जीत भारत के लिए क्या मायने रखती है।

1. भारत के लिए ‘असहज’ क्यों है यह जीत?

इतिहास गवाह है कि जब-जब BNP सत्ता में रही है, भारत और बांग्लादेश के रिश्ते बहुत सहज नहीं रहे हैं। इसके तीन प्रमुख कारण हैं:

• भारत विरोधी राजनीति: BNP की राजनीति का आधार ही ‘बांग्लादेशी राष्ट्रवाद’ रहा है, जो अक्सर ‘भारत विरोध’ (Anti-India) की भावनाओं को भड़काकर मजबूत होता है। चुनाव प्रचार के दौरान भी पार्टी ने भारत पर बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाया था।

• अतीत के कड़वे अनुभव: 2001 से 2006 के बीच, जब खालिदा जिया (BNP) की सरकार थी, तब भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (North East) में सक्रिय उग्रवादी समूहों को बांग्लादेश में पनाह मिलने की खबरें आम थीं। भारत को डर है कि कहीं वह दौर वापस न लौट आए।

• ‘इंडिया आउट’ अभियान: पिछले दो सालों में बांग्लादेश में चले “इंडिया आउट” कैंपेन को BNP के समर्थकों ने हवा दी थी। अब जब वे सत्ता में हैं, तो भारतीय सामानों और प्रोजेक्ट्स पर इसका असर पड़ सकता है।

2. अब रिश्तों का भविष्य क्या होगा? (The Road Ahead)

भले ही राजनीतिक बयानबाजी तीखी हो, लेकिन कूटनीति में ‘दोस्त बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं’। यह बात तारीक रहमान भी बखूबी समझते हैं।

• व्यापार और जरूरतें: बांग्लादेश अपनी रोजमर्रा की जरूरतों, प्याज, चीनी और मशीनरी के लिए भारत पर निर्भर है। इसके अलावा, मेडिकल टूरिज्म के लिए भी लाखों बांग्लादेशी हर साल भारत आते हैं। ऐसे में भारत से पूरी तरह रिश्ता तोड़ना BNP के लिए भी आत्मघाती होगा।

• तीस्ता जल समझौता: यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर BNP सरकार भारत पर दबाव बनाएगी। अगर भारत इस पर नरम रुख नहीं अपनाता, तो वे चीन की तरफ और झुक सकते हैं।

3. भारत की चिंताएं: हिंदुओं की सुरक्षा

सबसे बड़ी चिंता बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय को लेकर है। BNP के गठबंधन में अक्सर जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी दल शामिल रहे हैं। चुनाव के बाद अक्सर वहां हिंदुओं पर हमले देखे गए हैं। मोदी सरकार के लिए यह सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती होगी कि नई सरकार के राज में वहां के अल्पसंख्यक सुरक्षित रहें।

निष्कर्ष:

तारीक रहमान की जीत भारत के लिए एक कूटनीतिक परीक्षा की तरह है। अब ‘हसीना मॉडल’ वाली दोस्ती शायद देखने को न मिले, लेकिन भारत को एक ‘वर्किंग रिलेशनशिप’ (कामचलाऊ रिश्ता) बनाने के लिए अपनी रणनीति बदलनी होगी। आने वाले कुछ महीने यह तय करेंगे कि यह पड़ोसी मुल्क भारत का दोस्त बना रहता है या सिरदर्द बन जाता है।

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