तारीख: 14 फरवरी

रिपोर्ट: RajkaajNews

नई दिल्ली/श्रीनगर:

14 फरवरी 2019 का वो काला दिन भारत कभी नहीं भूल सकता। पुलवामा में CRPF के काफिले पर हुए हमले में हमने अपने 40 वीर जवान खो दिए। लेकिन इस हमले के बाद सोशल मीडिया पर एक सवाल बार-बार उठता है— “भारत के पास इतनी आधुनिक जासूसी सैटेलाइट्स (Spy Satellites) हैं, तो उन्होंने उस RDX से भरी कार को क्यों नहीं देखा?”

आज राजकाज न्यूज़ आपको इस सवाल का तकनीकी और असली सच बताने जा रहा है।

1. सैटेलाइट कोई CCTV कैमरा नहीं है

आम जनता को लगता है कि अंतरिक्ष में लगी सैटेलाइट्स किसी CCTV कैमरे की तरह होती हैं जो 24 घंटे ज़मीन के एक हिस्से पर नज़र रखती हैं। यह सच नहीं है।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, जासूसी सैटेलाइट्स पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में घूमती रहती हैं। वो किसी एक जगह (जैसे पुलवामा हाईवे) पर दिन में सिर्फ़ कुछ ही मिनटों के लिए आती हैं। जिस वक़्त आतंकी आदिल अहमद डार अपनी गाड़ी लेकर निकला, ज़रूरी नहीं कि उस वक़्त भारत की कोई सैटेलाइट ठीक उसके ऊपर से गुजर रही हो।

2. भीड़ में ‘मौत की गाड़ी’ पहचानना नामुमकिन

जिस जम्मू-श्रीनगर हाईवे (NH-44) पर यह हमला हुआ, वहां रोज़ाना हज़ारों गाड़ियां चलती हैं। सैटेलाइट ऊपर से सिर्फ़ यह देख सकती है कि “सड़क पर गाड़ियां चल रही हैं”।

हमलावर एक Maruti Eeco कार में था, जो कश्मीर में एक आम गाड़ी है। अंतरिक्ष से यह पता लगाना कि हज़ारों कारों में से “कौन सी कार” आतंकी की है और “कौन सी कार” आम नागरिक की, बिना किसी ज़मीनी ख़ुफ़िया जानकारी (Ground Intelligence) के नामुमकिन है।

3. सैटेलाइट के पास X-Ray विज़न नहीं होता

यह कोई हॉलीवुड फिल्म नहीं है। सैटेलाइट सिर्फ़ गाड़ी की छत (Roof) देख सकती है। उसके पास ऐसी कोई तकनीक नहीं होती जो लोहे की बॉडी के आर-पार देखकर यह बता सके कि पिछली सीट पर सब्ज़ी रखी है या 200 किलो RDX। विस्फोटक का पता सिर्फ़ चेकिंग से ही चल सकता था।

4. असली चूक कहाँ हुई? (NIA की जांच)

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की 13,500 पन्नों की चार्जशीट के मुताबिक, यह हमला तकनीकी विफलता (Technical Failure) नहीं, बल्कि खुफिया तंत्र (Intelligence) की चूक थी।

आतंकियों ने विस्फोटक (Ammonium Nitrate और RDX) को धीरे-धीरे जमा किया था और उसे एक आम दिखने वाली गाड़ी में फिट कर दिया था। सैटेलाइट बंकर देख सकती है, मिसाइल देख सकती है, लेकिन एक आम कार के अंदर छिपा बारूद नहीं।

पुलवामा हमला हमें सिखाता है कि टेक्नोलॉजी कितनी भी आगे बढ़ जाए, ज़मीन पर तैनात “खबरी” और “सर्तकता” का कोई विकल्प नहीं है। सैटेलाइट्स पर सवाल उठाने के बजाय हमें अपनी ज़मीनी सुरक्षा को और मज़बूत करना होगा।

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