विशेष राजनीतिक विश्लेषण – नई दिल्ली / पटना: लोकतंत्र में नेताओं की लोकप्रियता उनकी नीतियों और ज़मीनी कार्यों से बनती है, लेकिन जब राजनीति में “प्रशंसा” की जगह “अंध-चाटुकारिता” ले ले, तो वह फायदे के बजाय खुद नेता की गरिमा और पार्टी के ग्राफ को रसातल में धकेलने लगती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर इन दिनों एक ऐसा ‘चापलूसी सिंड्रोम’ हावी हो चुका है, जहाँ नेता अपने आलाकमान को खुश करने की होड़ में ऐसे तर्क गढ़ रहे हैं जिन्हें सुनकर एक सामान्य समझ वाला नागरिक भी असहज हो जाए। इसका सबसे ताजा और हैरान करने वाला उदाहरण बिहार की सियासत से सामने आया, जहाँ भाजपा के वरिष्ठ नेता सम्राट चौधरी के एक बयान ने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। जब आस्था को सियासत की चौखट पर झुका दिया गया एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सम्राट चौधरी ने चाटुकारिता की सीमा लांघते हुए यहाँ तक कह दिया कि “प्रभु श्रीराम टेंट में थे, गरीबों को मकान मिल रहा था तो उन्होंने मोदी जी से घर मांगा… तब कोर्ट में जीत के बाद राम मंदिर बना”। सनातनी परंपरा में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को ब्रह्मांड का पालनहार माना जाता है। ऐसे में करोड़ों हिंदुओं के आराध्य को एक सरकारी कल्याणकारी आवास योजना के ‘लाभार्थी’ के रूप में पेश करना और यह दावा करना कि स्वयं भगवान राम प्रधानमंत्री से घर मांग रहे थे—यह कोई आस्था का प्रकटीकरण नहीं, बल्कि चापलूसी की पराकाष्ठा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विपक्ष पर सनातन के अपमान का आरोप लगाने वाली भाजपा के अपने ही बड़े नेता जब वोट बैंक और चाटुकारिता में भगवान के कद को छोटा करके दिखाने लगें, तो इससे निष्पक्ष, धार्मिक और विचारशील मतदाताओं के बीच पार्टी की छवि को भारी झटका लगना तय है। तारीफ़ों के बेतुके पुल: फायदे से ज़्यादा नुकसान समस्या सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है। भाजपा प्रवक्ताओं, मंत्रियों और सोशल मीडिया इकोसिस्टम का एक बड़ा हिस्सा आज ऐसे दावों की झड़ी लगा रहा है, जो किसी भी तर्कशील व्यक्ति की समझ से परे हैं: यूक्रेन-रूस युद्ध रुकवाने के अतिरंजित दावे हों या प्रधानमंत्री को ‘दैवीय/अवतारी’ सत्ता साबित करने की होड़, ऐसे बयान आम जनता को प्रभावित करने के बजाय मीम्स और ट्रोलिंग का हथियार बन जाते हैं। जब ज़मीनी स्तर पर जनता महंगाई, बेरोज़गारी, प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और आर्थिक विषमता से जूझ रही हो, तब नेताओं का ज़मीनी मुद्दों से कटकर इस कदर ‘व्यक्ति-पूजा’ में डूब जाना जनता में खीझ और उपहास पैदा करता है। नतीजतन, जो प्रधानमंत्री 2014 और 2019 में एक सशक्त, कार्यकुशल और ज़मीनी नेता के तौर पर स्थापित हुए थे, उनके इर्द-गिर्द खड़े चाटुकारों ने उनकी छवि को एक ऐसे स्तर पर ला खड़ा किया है जहाँ सोशल मीडिया पर तीखा असंतोष और आलोचनाएं अब खुलेआम देखने को मिल रही हैं। राजनीतिक मंथन: अनुशासन नहीं तो 2029 की राह होगी कांटों भरी 2024 के आम चुनाव में 240 सीटों पर सिमटना भाजपा के लिए एक स्पष्ट चेतावनी थी कि जनता अब खोखले दावों और अंध-प्रशंसा के बजाय वास्तविक काम और ज़मीनी संवाद को तवज्जो दे रही है। यदि पार्टी नेतृत्व ने अपने नेताओं को अनुशासित आचरण और मर्यादा का पाठ नहीं पढ़ाया, तो नुकसान अपूरणीय होगा: 1. तटस्थ वोटरों का छिटकना: कट्टर समर्थक भले हर बयान का बचाव कर लें, लेकिन चुनाव हमेशा फ्लोटिंग और मिडिल-क्लास वोटर जिताता है। इस तरह की हास्यास्पद बयानबाज़ी से यह संवेदनशील वर्ग पार्टी से दूर हो रहा है। 2. आंतरिक संवाद का खत्म होना: जब किसी संगठन में केवल जी-हुजूरी करने वालों को पद और सम्मान मिलने लगता है, तो ज़मीन की सच्ची रिपोर्ट शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचना बंद हो जाती है। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Post navigation चुनावी लालच में शिवराज ने MP को धकेला ₹6 लाख करोड़ के कर्ज़ के दलदल में, अब उबारना किसी के बस की बात नहीं: दिग्विजय सिंह