भोपाल:

मध्य प्रदेश की सत्ता में जो खींचतान अब तक बंद दरवाजों के पीछे फुसफुसाहटों तक सीमित थी, उसने बुधनी के कोसमी वनक्षेत्र में खुली जंग की शक्ल ले ली है। वन विभाग की जेसीबी जब बारेला आदिवासियों के कच्चे आशियानों पर गरजी, तो उसकी गूंज सिर्फ जंगलों में नहीं, बल्कि वल्लभ भवन से लेकर दिल्ली तक सुनाई दी। यह महज जमीन के एक टुकड़े का कानूनी विवाद नहीं, बल्कि सूबे में सत्ता के नए केंद्र और पुराने जननायक के बीच शक्ति संतुलन की सीधी परीक्षा बन चुका है।

‘मामा’ का दिल्ली रुख और आधी रात को मैदान में ‘कार्तिकेय’

घटना के फौरन बाद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मौके पर पहुंचकर स्पष्ट कर दिया कि अपने राजनीतिक गढ़ में वह किसी भी तरह का प्रशासनिक हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने साफ शब्दों में याद दिलाया कि प्रदेश की यह व्यवस्था इन्हीं आदिवासियों के भरोसे खड़ी है।

शिवराज जब दिल्ली की ट्रेन में सवार हुए, तो आंदोलन की कमान उनके पुत्र कार्तिकेय सिंह चौहान के हाथ आ गई।

 सर्द रात में जमीन पर बैठकर बेघर परिवारों के साथ खाना बांटना।

 देर रात दो बजे तक महिलाओं और मासूम बच्चों के बीच बैठकर प्रशासन को सख्त लहजे में अल्टीमेटम देना।

 स्थानीय अफसरों की कार्यप्रणाली को सीधे मानवाधिकार और जनभावनाओं के खिलाफ बताना।

कार्तिकेय का यह तेवर साफ संदेश दे गया कि बुधनी की कमान नई पीढ़ी के हाथों में भी उतनी ही मजबूती से कायम है।

भोपाल कूच का अल्टीमेटम और हिलता हुआ प्रशासनिक तंत्र

बात सिर्फ धरने तक नहीं रुकी। जब सैकड़ों आदिवासी सिर पर बोरियां और गोद में बच्चे लिए राजधानी की ओर पैदल निकल पड़े, तो प्रदेश के गृह और खुफिया महकमे में हलचल मच गई। एक पूर्व मुख्यमंत्री के क्षेत्र से आदिवासियों का मुख्यमंत्री निवास की ओर पैदल मार्च निकलना, शासन के लिए बड़ी असहज स्थिति पैदा कर रहा था।

 तत्काल संपर्क: हालात बेकाबू होते देख शीर्ष स्तर पर बातचीत के तार जोड़े गए।

 सुलह की पहल: मुख्य सचिव स्तर पर जांच बैठाई गई और वरिष्ठ अधिकारियों को भेजकर मौके पर ही राहत और पुनर्वास की गारंटी दी गई।

 मार्च रुका, तनाव बरकरार: ठोस आश्वासन मिलने के बाद आदिवासियों ने भोपाल की ओर बढ़ते कदम भले ही रोक लिए हों, लेकिन असंतोष की आंच ठंडी नहीं हुई है।

दिल्ली के गलियारों में गूंज

सियासी हलकों में चर्चा गर्म है कि शिवराज सिंह चौहान ने इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के सामने रख दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जिस आदिवासी समाज को पार्टी संगठन अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखता है, उसी समाज के विरुद्ध शिवराज के गृह क्षेत्र में ऐसी सख्त कार्रवाई किसकी अनुमति से हुई? क्या यह स्थानीय अफसरों की मनमानी थी या फिर पूर्व मुख्यमंत्री के रसूख को चुनौती देने की कोई रणनीति?

यह टकराव लंबा क्यों खिंचेगा?

1. बुधनी का सियासी स्वाभिमान: बुधनी शिवराज सिंह चौहान का अभेद्य किला रहा है। यहां प्रशासनिक स्तर पर कोई भी बड़ा फैसला उनके प्रभाव को सीधा प्रभावित करता है।

2. वर्चस्व की नई लकीर: नई सरकार अपनी प्रशासनिक पकड़ को मजबूत करना चाहती है, जबकि पुराना खेमा अपने जमीनी जनाधार पर किसी भी प्रकार की आंच नहीं आने देना चाहता।

3. अगली पीढ़ी का उदय: कार्तिकेय के इस आक्रामक नेतृत्व ने साबित कर दिया है कि वे केवल पर्दे के पीछे की राजनीति नहीं करेंगे, बल्कि जमीन पर उतरकर सीधे फैसले लेने की क्षमता रखते हैं।

बुधनी में प्रशासनिक मशीनें फिलहाल थम गई हैं, लेकिन ‘शिवराज बनाम मोहन’ के इस सियासी मुकाबले ने यह साफ कर दिया है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में शक्ति का संतुलन अब एकतरफा नहीं रहा। आने वाले दिनों में यह तनाव फैसलों और कार्यशैली में और मुखर रूप में दिखेगा।

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